नन्दजी के लाला चीर हमारो मोहन दीजिए
एक समय ब्रजगोप बालिका मन में कियो विचार
कात्यायनि पूजा की ठानी यमुना कियो विहार -नन्द
वस्त्र खोल तीर पर धर दिए आप गइ जल मांय
काना वस्त्र उठाले टांगे पेड कदम पर जाय - नन्द
पतोचल्यो जब डरी गोपिका विनय करे कर जोर
चीर हमारो देदो मोहन हम दासी हैं तोर - नन्द -
दासी होतो बात मान लो जल से बाहर आवो
हाथ जोड़ कर अपने अपने वस्त्र आप लेजावो-नन्द
जल से बाहर कैसे आवें आप पुरुष हम नारी
वस्त्र हीन जो बाहर आ जावे लाज हमारी-नन्द
हमकोही चाहो हमसे परदा कैसी बुद्धि तिहारी
भेद बुद्धि से तो तुम हमको कबहुन पावो प्यारी-नन्द
हाथ जोडकर बाहर आइ करी कृपा गिरधारी
वस्त्र दिए सब धारण कीने मन प्रसन्न अतिभारी-नन्द
शरद पूनम पर आना प्यारी रास रचेगे भारी
दास भागवत शरण आपकी महिमा जगसे न्यारी-नन्द