प्रबोधिनी एकादशी,पद्मिनी एकादशी,परमा एकादशी-की कथा ekadashi vrat katha book in hindi pdf

 एकादशी-की कथा ekadashi vrat katha book in hindi pdf

[ 24-कार्तिक शुक्ला प्रबोधिनी एकादशी ]


भगवान बोले-हे धर्मराज! अब मैं कार्तिक कृष्णा एकादशी की कथा कहता हूँ, जिसे तुम ध्यान से श्रवण करो।यह एकादशी पापों का नाश करके सुख पहुँचाने वाली है। यह एकादशी सांसारिक सुख को देने के साथ-साथ अन्त में सद्गति देने वाली है, एकादशी का व्रत करने वाले को सब इन्द्रियों को वश में कर बुरे कर्मों का त्याग कर देना चाहिए। भगवान विष्णु की पूजा धूप-दीप अध्ययं नैवेद्य आदि से पूजा कर रात में जागरण करना चाहिए इस प्रकार विधिपूर्वक जो प्रबोधि नी एकादशी का व्रत करता है वह संसार में सभी सुखों को भोगकर अन्त में मुक्ति के सुख को प्राप्त करता है।इसलिए सुख और मुक्ति को चाहने वालों को यह व्रत अवश्य ही करना चाहिए।

[ 25-अधिकमास शुक्ला पद्मिनी एकादशी ]



इतनी कथा सुनने के बाद भगवान बोले-हे. धर्मराज! अब मैं पद्मिनी एकादशी की कथा सुनाता हूँ। इसका व्रत करने वालों को भगवान अपना भक्त बना लेते हैं। यह सब सन्तायों को हरने वाली व भक्तों का कल्याण करने वाली है इस व्रत के करने वालों को काम, क्रोध, कपट, अभिमान, छल आदि छोड़कर दशमी के दिन भगवान की पूजा करनी चाहिए। इस दिन मांस, हरी सब्जी, दाल, पराया अन्न, विषय भोगों से सर्वथा दूर रहना चाहिए। केवल चावल व जौ का हल्का आहार ही लेना चाहिए। रात्रि को भगवान का स्मरण करते रहें, जमीन पर सोये एकादशी के दिन प्रात: उठकर स्नानादि से शुद्ध होकर विधिपूर्वक विष्णु भगवान की पूजा करनी चाहिए। मन्दिर में जाकर धूप-दीप, नैवेद्य, चंदन आदि सुगन्धित पदार्थों से भगवान शंकर की पूजा करनी चाहिए। इस तरह जो विधि से एकादशी का व्रत करता है वह संसार के सभी सुखों को पाकर इस लोक में आनन्द भोगता है और अन्त में मोक्ष को पाता है।

[ 26-अधिकमास कृष्णा परमा एकादशी ]

युधिष्ठिर बोले-हे भगवान। अब आप अधिक मास कष्णा परमा एकादशी कथा का वर्णन कीजिए। भगवा बोले- हे धर्मराज। यह एकादशी परम श्रेष्ठ एकादशी है। इस व्रत से लोक और परलोक दोनों में परम सख प्राप्त होता है। बहुत समय पहले एक सुमेध नामक धर्मात्मा ब्राह्मण कपिला नगरी में रहता था। उसकी स्त्री भी बड़ी धर्म परायण और पतिव्रता थी। ब्राह्मण निर्धन था इसलिए कभी-२ निराहार रहना पड़ता था। ब्राह्मण की स्त्री स्वयं भूखी रहकर भी अतिथि को भोजन कराती थी। एक दिन ब्राह्मण ने अपनी स्त्री से कहातुम मेरी बहुत सेवा करती हो किंतु हमारी गरीबी मुझसे देखी नहीं जाती। इसलिए धन कमाने के लिये मैं अब विदेश जाना चाहता हूँ। ब्राह्मण की पत्नी आँखों में - आँसू भरकर कहने लगी पतिदेव सुख भाग्य से मिलता है यदि पिछले जन्म में हम लोगों ने दान पुण्य किया मला तो इस जन्म में हमें सुख मिलता। हमारे भाग्य में दुःख लिखा है इसलिए दोनों मिलकर खुशी-२ दुःख के दिन बिता देंगे। स्त्री पति के बिना नहीं रह सकती इसलिए आप परेशान नहीं होकर यहीं पर रहें पत्नी की बात सुनकर ब्राह्मण वहीं रह गया। इसी अवसर पर कौड़ेय कृषि घूमते-फिरते उधर आ निकले। ब्राह्मण न अभि दन करके उनका सत्कार किया। ऋषि के कुशल पूछन पर ब्राह्मण ने अपनी गरीबी और दुख से छूटने का उपाय पूछा। ऋषि ने कहा- हे विप्र गरीबी दूर करने तथा धन प्राप्ति के लिए तुम्हें अधिक मास की कृष्णा परमा एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करना चाहिये। हे धर्मराज! ब्राह्मण तथा उसकी स्त्री ने विधिपूर्वक परमा एकादशी का व्रत किया जिसके प्रभाव से उसी समय एक राजकुमार उधर से घूमता हुआ आ निकला। उसे ब्राह्मण को रहने के लिए अच्छा महल व ५ गाँव निर्वाह को दिये। ब्राह्मण और उसकी स्त्री सुखपूर्वक महल में रहने लगे। सूतजी ने कहा-भगवान श्रीकृष्ण जी के मुख से कथा श्रवण कर और विधिपूर्वक व्रत करके धर्मराज युधिष्ठिर स्वयं स्वर्ग को पहुँच गये। इसलिये धन और राजसुख चाहने वालों को यह व्रत अवश्य करना चाहिए।

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