[ 20- भाद्रपद शुक्ला वामन एकादशी ]
धमराज बोले-हे योगिराज! अब आप भाद्रपद शुक्ला एकादशी की कथा सुनायें तो बड़ी कृपा होगी। भगवान बोले-इस एकादशी का नाम वामन एकादशी है। इसकी कथा इस प्रकार है- एक समय राजा बली ने सोचा कि मैं देवताओं को जीतकर स्वर्ग का राजा बन जाऊँ वामन के स्वर्ग पर अधिकार करने पर देवताओं ने रक्षा के लिये मुझसे याचना की। मैंने देवताओं की याचना से खुश होकर वामन अवतार लिया और राजा बलि से तीन कदम भूमि की याचना की। तब अभिमानी राजा बलि ने कहा कि जहाँ चाहो तीन कदम भूमि नाप लो, तब मैंने एक कदम से स्वर्ग, दूसरे कदम से पृथ्वी व तीसरा बलि के सिर पर जोर से रखकर उसको पाताल लोक में भेज दिया। पाताल लोक में वह मेरी मूर्ति । बनाकर पूजा करने लगा और भाद्रपद शुक्ला एकादशी " को विधिपूर्वक व्रत किया जिससे वह अत्यन्त सुखी हुआ और आनन्दमय जीवन बिताने लगा। इसलिए जो । भाद्रपद शुक्ला एकादशी का व्रत करता है उसके सब दुःख दूर होते हैं।
[ 21- आश्विन कृष्णा इन्दिरा एकादशी ]
भगवान बोले-अब मैं सब पापों से रक्षा करने वाली नीच योनि को प्राप्त पितरों को अच्छी गति देने वाली आश्विन कृष्ण का वर्णन करता है।बहुत समय पहले महिष्मती नामक नगर में इन्द्रसेन नामक राजा राज्य करता था। एक दिन नारद मुनि ने उनके राज्य में आकर राजा से कहा कि तुम्हारे पिता किसी पाप से नर्क में पड़े हुए हैं और यातनायें भोग रहे हैं। अपने पिता को नर्क से छुड़ाकर स्वर्ग में पहुँचाने के लिए आपको आश्विन कृष्णा एकादशी का व्रत करना चाहिए। राजा ने कहा-मैं अवश्य व्रत करूँगा। कृपा कर इसकी सम्पूर्ण विधि भी बताने का कष्ट करें। नारद जी बोले हे राजन्! आश्विन कृष्णा दशमी के दिन प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर पितरों का श्राद्ध करके ब्राह्मण भोजन कराकर आप एक समय भोजन करें। एकादशी को सुबह पवित्र होकर भगवान शालिग्राम की मूर्ति के सामने श्रद्धा से प्रणाम करके प्रार्थना करें कि मैं आपकी शरण में हूँ, मेरी रक्षा करो मुझ पर प्रसन्न हो फिर ब्राह्मणों को भोजन करा अच्छी दक्षिणा देवे। गौ को भी बचा हुआ भोजन खिलावें। दिन भर नीच कर्मों से बचते हुए रात को जागरण करना चाहिए। द्वादशी को फिर ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा देवे बाद में आप परिवार के साथ मौन | होकर भोजन करे। नारद ऋषि विधि बताकर स्वर्ग को ले गया। राजा में ने बताई हुई विधि से आश्विन कृष्णा इन्दिरा एकादशी का व्रत किया जिसके प्रभाव से राजा के पिता नर्क नछाड़कर विमान द्वारा स्वर्ग को चला गया। इसलिए संसार में सुखों को भागते हुए अन्त में स्वर्ग जाने की इच्छा वालों को यह व्रत करना चाहिए। इस व्रत से पितरों को सद्गति प्राप्त होती है।
एकादशी- की कथा का वर्णन