
[ 3-माघ कृष्णा षटतिला एकादशी ]
भगवान ने कहा कि अब मैं माघ कृष्णा एकादशी की कथा का वर्णन करूँगा। माघ के महीने में यह व्रत करने से मनुष्य सब सुखों को पा अन्त में स्वर्ग के सुख भोगता है व्रत करने वाले को नीच कर्म छोड़कर शुभ कर्म धारण करने चाहिए और व्रत के दिन रात को विष्णु भगवान का ध्यान करते हुए चंदन, फल, फूल, अगर, नारियल और कपूर से पूजा कर १०८ बार हवन करें। बाद में अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए भगवान से प्रार्थना कर फिर उत्तम ब्राह्मणों को तिल के लड्डू, जल-पान, अन्न, वस्त्र, ऊन, दूध आदि पदार्थ देने चाहिए। इस एकादशा का तिलों द्वारा पूजन एवं तिलों का दान देना उत्तम है।
अब षटतिला एकादशी की कथा सुनाता हूँ
ध्यानपूर्वक सुनो। बहुत पुराने समय में कुरुक्षेत्र में एक धर्मात्मा बुढ़िया रहती थी वह अपना अधिक समय व्रत उपवास में ही व्यतीत करती थी किन्तु कभी किसी ब्राह्मण को न ही उसने खाना खिलाया था और न अन्नदान ही किया था। एक दिन स्वयं विष्णु भगवान ब्राह्मण के वेष में बुढ़िया के घर भिक्षा माँगने गये तब बुढ़िया ने चिढ़कर एक ईंट उनकी झोली में डाल दी और कहा कि इसे खा लेना विष्णु भगवान उस ईंट को लेकर विष्णुलोक को चले गये। अपने व्रत के प्रभाव से बुढ़िया मरने पर सीधी स्वर्ग में पहुँची वहाँ सुन्दर भवन था जिसमें सब साधन थे किन्तु खाने पीने की कोई चीज नहीं थी। भूख-प्यास से व्याकुल होकर बुढ़िया विष्णु भगवान के पास गई और बोली-भगवान! मैंने सदा व्रत और उपवास करते हुए जीवन बिताया है। सभी पुराणों की कथायें सुनी है और कठिन तप एवं साधन भी किये हैं फिर भी मुझे यहाँ खाने-पीने की चीजें क्यों नहीं मिल रही हैं? भगवान विष्णु बोले-जिन चीजों का दान तुमने मृत्युलोक में किया है वहीं यहाँ मिल सकता है मैं स्वयं एक बार तुम्हारे घर पर भिक्षा लेने आया था तब तुमने मेरी झोली में ईंट डाली थी - और कहा था कि खा लो।
माघ कृष्णा षटतिला एकादशी
बुढ़िया फूट-फूट कर रोने लगी और बोली-मेरा अपराध क्षमा करो। हे भगवन! मुझे ऐसा उपाय बतलाने का कष्ट करें जिससे मुझे यहाँ अन्न-जल मिल सके। भगवान ने कहा-तुम अब व शीघ्र ही मृत्युलोक में वापिस चली जाओ नहीं तो यदि यहाँ की अन्य देवियाँ तुम्हें देख लेंगी तो तुम्हारा अनिष्ट कर देंगी इसलिए शीघ्र ही चली जाओ। ब्राह्मणी ने हाथ जोड़कर रोते हुए कहा कि हे भगवन! मृत्युलोक में जाकर मुझे क्या करना चाहिये। जिससे मुझे यहाँ आने पर अन्न-जल मिल सके। भगवान बोले- माघ महीने में षटतिला नाम की एकादशी के दिन व्रत करना और इस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मण को तिल, अन्न-धन, वस्त्र, पात्र तथा गऊदान देना, जिससे तुमको यहाँ आने पर अन्न-जल मिल सके जो वहाँ दोगी वहीं यहाँ पर मिलेगा। बुढ़िया यह सुनकर मृत्युलोक में आ गई। यहाँ आकर उसने सब एकादशियों का विधिपूर्वक व्रत और अनुष्ठान किया साथ में अन्न, वस्त्र और सुन्दर सुन्दर मधुर फल, मिठाई आदि का दान भी करने लगी। अन्त में मरने पर जब स्वर्ग में पहुँची तो वहाँ सब सुखों के साथ खाने-पीने के भी उत्तम पदार्थ बुढ़िया को मिले।
माघ कृष्णा षटतिला एकादशी