चैत्र कृष्णा पापमोचनी एकादशी कथा

चैत्र कृष्णा पापमोचनी एकादशी कथा

[ 9-चैत्र कृष्णा पापमोचनी एकादशी ]

धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण जी से कहा कि अब आप हमें पापमोचनी एकादशी की कथा सुनाइए भगवान बोले-यह एकादशी आठ सिद्धि नौ नाध को प्रदान करती है। एक समय की बात है कि कुबेर के बाग में च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी ऋषि बड़ी कठोर तप साधना में लगे थे तब इन्द्र ने सोचा कि यदि मेधावी की तपस्या सफल हो गई तो मेरा इन्द्रासन छीनकर इन्द्रलोक के राजा बन जायेंगे इसलिए उनकी तपस्या भंग करने के लिए विघ्न डालना चाहिए। यह सोचकर इन्द्र ने कामदेव और मंजुचोसा अप्सरा को हुक्म दिया कि मेधावी ऋषि की तपस्या भंग करो। हुक्म होते ही दोनों ने अपना काम शुरु कर दिया। कामदेव ने अपने काम के तीर चलाने आरम्भ किए और अप्सरा ने मधुरता से नाचना आरम्भ कर दिया। समाधि टूटने पर मेधावी ने एक सुन्दरी को नाचते हुए देखा। वे उसके रूप व लावण्य से मोहित होकर एकटक उसकी तरफ देखने लगे। कामदेव के वशीभूत हो दूसरे की स्त्री में आसक्ति होने के कारण मेधावी ऋषि की तपस्या नष्ट हो गई।

चैत्र कृष्णा पापमोचनी एकादशी

जब मेधावी ऋषि को यह ज्ञात हुआ कि इस स्त्री में आसक्ति होने के कारण मेरी तपस्या भंग हुई है तो वे क्रोध में भरकर अप्सरा को शाप दे बैठे कि तूने मेरी तपस्या भंग कर दी है इसलिए तु पिशाच योनि को प्राप्त कर बहुत कष्ट उठायेगी। वह अप्सरा बोली हे ऋषिराज! मेरे कर्म का फल मुझे मिला है लेकिन कृपा करके आप मुझे पिशाच योनि से छूटने का उपाय भी बताने का कष्ट करें। मुनि बोले-हे नीच अप्सरा। तूने क्षमा नहीं करने योग्य कर्मम किया है फिर भी तुझ पर दयाकर मुक्ति पाने का उपाय बताता हूँ। तू चैत्र मास की एकादशी का व्रत विधि-विधान पूर्वक कर जिससे तेरा पाप नष्ट होकर तू पिशाच योनि से छूट जायगी और फिर अप्सरा बनकर इन्द्रलोक में विचरण कर सकेगी।- इसके बाद वह पिशाच योनि को पाकर पृथ्वी पर भटकने लगी। जब चैत्र की एकादशी आई तब उसने बड़ी श्रद्धा से विधिपूर्वक पापमोचनी एकादशी का व्रत किया जिसके प्रभाव से वह पिशाच योनि से मुक्त होकर फिर से इन्द्रलोक में पहुँच गई।

चैत्र कृष्णा पापमोचनी एकादशी

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