
[ 8- फाल्गुन शुक्ला एकादशी ]
धर्मराज ने कहा- हे भगवन! अब आप हमें फागुन शुक्ला एकादशी की कथा सुनाइये। भगवान ने कहा- भारत वर्ष में पहले समय में चित्ररथ नाम का राजा राज्य करता था। उसके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी। कोई गरीब या दुःखी नहीं था। न्यायपूर्वक शासन करने से सारी प्रजा राजा से प्रसन्न थी। राजा हर एकादशी को प्रजा के साथ विधिपूर्वक व्रत करता था जिससे उसके राज्य में कभी अकाल नहीं पड़ा, किसी को दैविक, दैहिक व भौतिक क्लेश नहीं था। एक रात को जब राजा एकादशी व्रत का जागरण कर रहा था तो एक शिकारी भूख प्यास से व्याकुल उधर आकर राजा व अन्य बड़े लोगों के साथ बैठ गया और एकादशी की कथा सुनने लगा सबेरा होने पर सब अपने-अपने घरों को चले गए शिकारी भी अपने घर चला गया। रात को कथा सुनने से शिकारी ने मांस खाना, शिकार करना और शराब पीना आदि सब बुरे कर्मों को छोड़ दिया और धर्मात्मा बन गया। अपने शुभ कर्मों से उस शिकारी ने मरने पर राजा चित्ररथ के घर में पुत्र रूप में जन्म लिया और उसका नाम बसुरथ रखा गया वह बचपन से ही बहादुर और धर्मात्मा था। बड़ा हान पर चित्ररथ ने राज्य का भार अपने पुत्र वसुरथ को सौंप दिया। राजा वसुरथ एक दिन शिकार खेलने वन में गया।
फाल्गुन शुक्ला एकादशी
वहाँ वह मार्ग भूलकर इधर उधर भटकने लगा भूख-प्यास से बहुत तड़प रहा था कि तभी उसने भगवान से प्रार्थना की कि हे भगवान! मैंने ऐसा कौन सा कर्म किया है, जिससे मैं इतना कष्ट उठा रहा हूँ।। तभी भगवान की प्रेरणा से उसको ध्यान आया कि आज एकादशी है और मैं प्राणियों की हिंसा कर पाप का भागी बन रहा हूँ इसी कारण मेरी यह दशा हो रही है।राजा ने भगवान से प्रार्थना की कि अब मैं किसी जीव की हिंसा नहीं करूँगा शिकार भी नहीं खेलूँगा। नीचता से दूर रहते हुए धर्म का आचरण करूँगा। राज्य की प्रजा को धर्म के मार्ग पर चलाऊँगा। ऐसी प्रार्थना करने पर वह कुछ आगे बढ़ा तो उसने देखा कि पास ही एक झरना है। वहाँ जाकर उसने अपनी प्यास बुझाई और पेड़ की छाया में सो गया। थकावट के कारण उसे गहरी नींद आ गई। उसी समय उसक शत्रु म्लेच्छ राज्य का राजा अपने सैनिकों के साथ उधर आ निकला। राजा को सोता देखकर उसने सोचा कि आज यह अकेला है इसलिए इसे मारकर काम तमाम कर देना चाहिए। राजा वसुरथ को देवी का इष्ट था। म्लेच्छ राजा वसुरथ को मारने के लिए ज्यों ही आगे बढ़ा त्या । देवी ने प्रकट होकर सब म्लेच्छ दुश्मनों का नाश कर दिया। राजा की नींद खुली तब उसने सोचा कि मेरे दुश्मन मरे पड़े हैं इन्हें किसने मारा है। वह इसी अचरज में था कि आकाशवाणी हुई कि हे राजन! तुम धर्मात्मा और एकादशी का व्रत रखने वाले हो इसलिए देवी ने प्रकट होकर आपके दुश्मनों का विनाश कर तुम्हारी रक्षा की है।
फाल्गुन शुक्ला एकादशी
राजा यह जानकर न्याय और धर्मपूर्वक शासन करने लगा इसलिए इस एकादशी का व्रत करने वालों की भगवान स्वतः ही रक्षा करते हैं। धर्मराज बोले- हे भगवान! इस व्रत का क्या विधान है सो बतायें। भगवान बोले कि आँवले के पेड़ के नीचे कलश स्थापित कर भगवान परशुराम की पूजा करनी चाहिए। धूप दीप आदि को अर्पित कर प्रार्थना करें कि हे भगवन! आप सब कष्टों को दूरकर सुख की वर्षा करने वाले हैं, मैं आपकी शरण में हूँ मेरे पर कृपा करो और शांति प्रदान करो। रात में विष्णु भगवान की पूजा कर सत्संग आदि में रात बितानी चाहिए। प्रातः शुद्ध होकर ब्राह्मणों को भोजन करावे और यथाशक्ति पात्र, वस्त्र आदि दान देवें।
फाल्गुन शुक्ला एकादशी