आषाढ़ कृष्ण योगनी एकादशी / आषाढ़ शुक्ला देवशयनी एकादशी-एकादशी व्रत कथा महात्म्य

[ 15- आषाढ़ कृष्ण योगनी एकादशी ]

भगवान बोले-हे धर्मराज! अब मैं तुम्हें आषाढ़ कृष्णा एकादशी महात्म्य बताऊँगा सो ध्यान से सुना। इस एकादशी का नाम योगिनी है। इससे कोढ़ आदि भयंकर रोगों से छुटकारा मिलकर सुख प्राप्त होता है। ___ एक बार अलकापुरी का राजा कुबेर पूजा कर रहा था और उसका माली पूजा के लिए फूल लाने गया था किंतु माली विषयों में फंस गया और पूजा के लिए फूल न ला सका। जब बहुत देर तक बाट देखने के बाद माली नहीं आया तब कुबेर ने माली को श्राप दिया कि तू कोढ़ी होकर पृथ्वी पर भटकता फिरेगा। राजा के श्राप से माली कोढ़ी होकर भटकने लगा। दुःखी होकर भगवान से प्रार्थना करने लगा कि मुझे इस संकट से बचाकर मेरी रक्षा करो। उसके बाद प्रार्थना करने पर प्रभु ने भक्त पर प्रसन्न होकर कहा कि यदि संकट से उद्धार चाहते हो तो आषाढ़ कृष्णा एकादशी का विधि पूर्वक व्रत करना जिससे यह रोग दूर हो जायेगा और आप सुख को पाओगे माली ने आषाढ़ कृष्णा एकादशी का व्रत किया जिसके कारण माली का कोढ़ दूर होगया और वह वह स्वर्ग को चला गया।

[ 16-आषाढ़ शुक्ला देवशयनी एकादशी ]

इतनी कथा सुनने के बाद भगवान ने कहा कि अब मैं आपको देवशयनी एकादशी का व्रत कहता हूँ। इस एकादशी का व्रत करने से मनुष्य के सब पाप नष्ट हा जाते हैं और वह सुख को भोगता है। बहुत समय पहल सतयुग में बहुत धर्मात्मा राजा मान्धाता हुए हैं वे प्रजा की सेवा में दिन रात लगे रहते थे। प्रजा भी उनको बहुत चाहती थी। दुर्भाग्य से उनके राज्य में वर्षा न होने के कारण भयंकर सूखा पड़ गया। प्रजा भूखी मरने लगी। यज्ञ, दान, पुण्य आदि शुभ कार्य बन्द हो गए प्रजा की बुरी दशा देखकर राजा अपने रथ में सवार होकर अपने कुलगुरु ऋषियों को शरण में जाकर उन्हें प्रणाम किया और निवेदन किया कि मेरे राज्य में भयंकर अकाल पड़ा हुआ है। प्रजा भूख से तड़पकर मरी जा रही है। कोई उपाय बतायें जिससे अकाल नष्ट हो और प्रजा की रक्षा हो सके। ऋषियों ने कहा कि तुम्हारी प्रजा अपने कर्तव्यों को छोड़ कर अधर्म में लग गई है अगर वह पुनः अपने कर्तव्यों में लगे तो यह परेशानी दूर हो सकती है। आपको प्रजा को कर्तव्य पालन की प्रेरणा देनी चाहिए और स्थान-२ पर तालाब, कँए, बाबड़ी नहरें आदि बनवायें जिससे खेती पैदा हो सके। राजा ने ऋषियों की आज्ञा मान कर स्थान-२ पर कुँए, तालाब बाबड़ी, नहरें आदि बनवाकर अपना कर्तव्य पालन किया और प्रजा के भी कर्तव्य पालन पर ध्यान दिया जिससे अकाल नष्ट होकर प्रजा को सुख प्राप्त हुआ। इसकी विधि यह है कि एकादशी के दिन भगवान को शयन करावे और जब चातुर्मास बाद तुला राशि पर सूर्य आवे तब इन्हें जगावें। मूर्ती को स्नान कराकर साफ आसन पर स्थापित करे। इसके बाद विधिपूर्वक चन्दन, धूप, नैवेद्य, पंचामृत तथा पुष्पादि से भगवान की पूजा करें उसके बाद ब्राह्मणों को भोजन करा दान आदि देकर विदा करें।

एकादशी व्रत कथा महात्म्य

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