मार्गशीर्ष कृष्णा उत्पत्ति एकादशी व्रत कथा / उत्पन्ना एकादशी का महत्त्व

मार्गशीर्ष कृष्णा उत्पत्ति एकादशी व्रत कथा

[ 1- मार्गशीर्ष कृष्णा उत्पत्ति ]

एकादशी व्रत कथा नैमिषारण्य आश्रम में हजारों ऋषियों को उपदेश देते हुए सूत जी बोले- भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जिस ग्यारस (एकादशी) का व्रत करने का उपदेश दिया था वह कथा मैं तुम्हें सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो।- भगवान श्रीकृष्ण से ग्यारस के व्रत का महात्म्य सुनकर अर्जुन ने कहा कि हे भगवान! मैं भी एकादशी का व्रत करना चाहता हूँ इसलिए इसके करने की विधि बताइए।
अर्जुन के वचन सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि जो एकादशी का व्रत करना चाहे उसे मार्गशीर्ष (मंगसिर) की एकादशी से व्रत शुरू करना चाहिए। दशमी के दिन सुबह चार बजे उठकर शौच आदि से निबटकर सूर्योदय से पहले ही भोजन करलें और बाद में दातुन कर मुख शुद्धि करें इसी प्रकार प्रतिदिन सोते समय अच्छी बातों का स्मरण करें दाँतों को साफकर शयन करते समय भगवान का ध्यान कर फिर सबेरे चार बजे उठकर नित्य कर्म करके दातुन व स्नानादि कर भगवान का नाम स्मरण करें। इसके बाद शरीर पर मिट्टी लगाकर शुद्ध जल से स्नान कर संकल्प बोले-हे भगवती! मेरे सब पापों को नष्ट करो।
हे अर्जुन! जिस एकादशी का व्रत करो उस दिन अच्छी संगत में रहें। पाखण्डी, चोर और दुष्टजनों से वार्तालाप व उनके दर्शन भी न करें। उस दिन नीच विचारों से बचकर बड़ी श्रद्धा और भक्ति से विष्णु भगवान की धूप दीप आदि सुगन्धित पदार्थों से पूजा करें। दिन-रात पवित्र रहकर हरि कीर्तन करते हुए एकादशी का व्रत करें। द्वादशी के दिन ब्राह्मण भोजन करायें और यथाशक्ति दान देवें। इस प्रकार ऊपर का नियम पालन करते हुए जो एकादशी का व्रत करता है उसे अनन्त काल के लिए स्वर्ग प्राप्त होता है। __ हे अर्जुन! भगवान विष्णु के दर्शन करने तथा गऊदान देने आदि शुभ कर्मों से जो फल प्राप्त होता है, उससे भी अधिक फल इस व्रत के करने से मिलता है। हजारों यज्ञ, तपादि को छोड़कर एकादशी के व्रत का पालन करें। जिससे काल के डर से मुक्त होकर संसार के सुखों के साथ स्वर्ग का सुख मिले। हे अर्जुन! बिना कुछ खाए बुराई से बचकर एकादशी का व्रत करने वाला इस संसार में अनन्त सुखों को भोगता है और स्वर्ग को जाता है।
उत्पन्ना एकादशी का महत्त्व
अर्जुन बोले-हे भगवान! आपकी बातों को सुनकर मुझे कुछ संदेह हो गया है क्योंकि एकादशी का व्रत करने वालों को मैंने दुःखी देखा है, सो इसका कारण बताइये और मेरे संदेह को दूर कीजिये। भगवान श्रीकृष्ण जी बोले कि व्रत उपवास करने से शरीर निरोग रहता है। व्रत उपवास करने वालों को कभी दवा लेने की आवश्यकता नहीं होती। इन व्रतों में एकादशी व्रत ही सर्वश्रेष्ठ है। दूसरे व्रतों से लाभ यह है कि बहुत सा अन्न धन बच जाता है सो अकाल में काम आता है। यह धन दीन दुखियों की सेवा में लगता है। इससे व्रत उपवास करने वालों को सुख प्राप्त होता है। इतनी कथा कहने के बाद भगवान श्रीकृष्ण जी बोले कि हे अर्जुन! ध्यान से सुनो मैं तुम्हें एकादशी व्रत का असली सार बताता हूँ। र व्रत करने से पहले मन में यह संकल्प करें कि मैं जीवन भर चाहे मुझ पर कैसा भी दुःख क्यों न आये परन्तु काम, क्रोध, लोभ, मोह व अभिमान से सदा दूर रहूँगा। इस तरह करने से हे अर्जुन! व्रत करने वाला मनुष्य सब सुख भोगकर स्वर्ग को जाता है। अर्जुन इस कथा को श्रवण कर बोले कि हे भगवान! क्या बीमार मानव को व्रत नहीं करना चाहिए? अर्जुन का प्रश्न सुनकर और हँसकर भगवान बोले कि बीमार और रोगी को व्रत नहीं करना चाहिए। हे अर्जुन! एकादशी का व्रत करने वाले से जो घर वाले लड़ते झगड़ते हैं, वे भी नरक में जाते हैं, इसलिए नीच कर्मों से बचते हुये जो थोड़ा सा फलाहार करते हैं वे भी स्वर्ग को जाते हैं। भगवान श्रीकृष्ण बोले-हे अर्जुन! अब मैं आपको मंगसिर एकादशी की कथा को कहता हूँ ध्यान से श्रवण करो। __एक बार मुर नामक बहुत बलवान राक्षस ने सभी देवताओं को युद्ध में हराकर स्वर्ग का राज्य छीन लिया, तब इन्द्र, कुबेर आदि सभी देवता भगवान शंकर की शरण में जाकर बोले कि उस राक्षस ने हमें हराकर स्वर्ग का राज्य छीन लिया है।
उत्पन्ना एकादशी का महत्त्व
आप उसे मारकर स्वर्ग का राज्य हमें दिलाकर कृतज्ञ कीजिए। देवताओं के वचन सुनकर भगवान शंकर ने कहा- हे देवताओं। आप इसी समय भगवान विष्णु के पास जाओ और उनसे विनय करो जिससे वे मुर राक्षस को मारकर आपका राज्य आपको दे देंगे। मैं अभी घोर तप कर रहा हूँ इसलिए मैं तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता। भगवान शंकर से निराश होकर सभी देवता क्षीरसागर में विष्णु भगवान के पास जाकर बोले- हे भगवान! हमारी रक्षा कीजिये, हमें मुर नामक राक्षस ने हराकर हमारा राज्य छीन लिया है आप उसका नाश करके हमारा राज्य हमको वापस दिलावें। देवताओं के दीन वचन सुनकर भगवान विष्णु बोले हे देवताओं मैं उस राक्षस को मारकर अवश्य तुम्हें स्वर्ग का राज्य दिलाऊँगा। इस प्रकार कथा सुनाते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि हे अर्जुन! भगवान विष्णु और मुर राक्षस में घोर संग्राम हुआ। भगवान ने सोचा कि अगर एकादशी के दिन राक्षस को मारता हूँ तो देवता लोग दुःखी होते हैं, वे इसी विचार में थे कि मुर राक्षस ने भगवान विष्णु पर भयंकर अस्त्र चलाये, जिससे घबराकर भगवान कैलाश की तरफ भागे। मुर राक्षस भी पीछे भागता हुआ आ रहा था। भगवान ने अपनी शक्ति से एक कन्या को प्रकट कर खड़ा कर दिया और स्वयं अन्तर्ध्यान हो गये। जब मुर राक्षस कन्या के पास पहुँचा तो कन्या ने अपने शस्त्र से राक्षस का सिर धड़ से अलग कर दिया। राक्षस के मरने से देवता प्रसन्न हुये और उस देवी की अनेक रूप से स्तुतियाँ की। इसके बाद भगवान विष्णु ने प्रकट होकर देवी से कहा- हे देवी! आज से तुम्हारा नाम एकादश है क्योंकि तुमने मार्गशीर्ष एकादशी को प्रकट होकर मुर नामक राक्षस को मारा है जो व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति से तुम्हारी पूजा करेगा वह सांसारिक सुखों को भोगता हुआ अन्त में विष्णुलोक को प्राप्त करेगा। यह कथा श्रवणकर श्रीकृष्ण बोले- हे अर्जुन! इस प्रकार जो मनुष्य एकादशी का व्रत करता है, वह सब दुःखों से छूटकर सुखी रहते हुए अन्त में स्वर्ग धाम को प्राप्त करता है। इसलिए संसार के सब सुखों को पाने के लिए एकादशी के दिन निराहार रहकर द्वादशी के दिन किसी दीन दुःखी ब्राह्मण को भोजन कराकर स्वयं करना चाहिए।
उत्पन्ना एकादशी का महत्त्व

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