ऐसे वेहाल विवाइन सों पग कंटक जाल लगे पुनि जोए
हाय महादुख पायो सखातुम आए इतेन किते दिन खोए
देख सुदामाकी दीनदशा करुणाकरके करुणानिधिरोये
पानीपरातको हाथ छुयो नही नैननकेजलसों पग धोए
bhagwat katha in hindi
कृष्ण सुदामा संवाद
कृष्ण--
बडीरे निठुरता तुमने धारी सुदामा भैया
बहुत दिनन मे दर्शनदीना कैसीदशा तुम्हारी
काहे दुख पायो पास मेरे क्यों न आयो
दिन बृथा ही गमायो मोहि याहि को विलग
वस्त्र फटे से पुराने अंग सकल सुखाने
नहीं जात पहिचाने हैपनैया नहीं पग
फटी विवाइ दोउ पांवन मे क्यों बनरहे भिखारी।। सुदामा।।
सुदामा--
काहे एतो दुःख पावे नीर नपनन बहावे
शाप देके पछितावे तेरी लीला है अपार
समय समय की है बात जब पढ़े एक साथ
अब भीख मांग खात या में काहे को विचार
मैं हूँ अतिहि दीन बन्धुतू दीनन को हितकारी ।।सुदामा।।
कृष्ण--
एक जग प्रतिपाल दूजो बन्योहै कंगाल
यह विधिना की चाल कछु लागे विपरीत
दीनबन्धु और दीन को है अमिट संबंध
कोटि करेह प्रबन्ध यह टूटे नही प्रीति
लइ दरिद्रता बांध गांठ से प्रीति न मेरी भुलाई।।सुदामा।।
सुदामा--
धन्य धन्य यदुराई मेरी करत बड़ाई
निज प्रभुता भुलाई नही भावे राजपाट
यासों कहत मिताइ जैसी कृष्ण ने निभाई
मैंने भीख माँग खाई कहाँ याके ठाट बाट
धोवे चरन भिखारी के यह भगतन को हितकारी।।सुदामा।।
कृष्ण--
छोड बृथा की यह बात पंडिताइ क्यों दिखात
कछुलायो है सोगात भाभी भेजी सो दिखाय
वहमोको अति प्यारी याद करे जो हमारी
कैसे रहे वो विचारी कछुमो कूहूं बताय
भेज्यो कहा संदेश सुनाय दे लगी चटपटी भारी।।सुदामा।।
सुदामा--
तू है द्वारका नरेश मेरो साधुकोसो भेष
तेरी भाभी को संदेश कहने मे आवे लाज
वापै धरी कहा भेंट जाको भरे नही पेट
है दरिद्र की चपेट ताहि संग लायो आज
आया हूं कछु कामइ ते पर कह न सकू गिरधारी।।सुदामा।।
कृष्ण--
कहबे में सकुचाय बृथा दीनता दिखाय
रहे मित्र से छिपाय दउं मांगे सोइ तोय
काम विपदा मे आवे सांचो मित्र वो कहावे
नहीं मित्र को भुलावे मन कपटी नहोय
तीन लोक की संपति तेरे चरन पर बलिहारी ।।सुदामा।।
इति अशीतितमोऽध्याय:
bhagwat katha in hindi
[ अथ एकाशीतितमोऽध्यायः ]
सुदामाजी को ऐश्वर्य प्राप्ति-श्रीशुकदेवजी बोले परीक्षित! काँख में दबाई हुई चावल की पोटली सुदामा से भगवान ने छीन ली और उसमें से एक मुट्ठी चावल चबा गए और उसके स्वाद का बखान करते हुए दूसरी मुट्ठी भी चबा गए और जब तीसरी मुट्ठी चबाने लगे तो रुक्मणी ने हाथ पकड़ लिया।
हाथ गयो प्रभुको कमला यहनाथ कहा तुमने चितधारी
तंदुलखाय मुठी दोउ दीनसंपदा दौउ लोकन की बिहारी
तीसरी मुट्ठी चबाय हरि कहां तुम रहने की आस बिचारी
रंकहि आप समान कियो तुम चाहत आपन होन बिखारी
रुक्मणि--
ब्राहमण की परतीत में सुख नहीं पायो कोय
बलिराजा हरिश्चन्द्र ने दिया राजपट खोय
दिया राजपट खोय हरीजिन जनक दुलारी
तीन लोक के नाथ लात तिनहुँ को मारी
कृष्ण--
भूल गई कमला तुम तो ब्राह्मण सब दुख टारन हारो
लेपतियां हमको जुदई वह ब्राह्मण हमको मिलावनवारो
गुरु ब्राह्मण है सबरेजगकोजगकी त्रयताप मिटावनवारो
ब्राह्मण मेरोहे पूज्यसदा या ब्राह्मण से परमेश्चर हारो
विप्र प्रसादात् धरणी धरोहं विप्रप्रसादात गिरवर धरोहं
विप्रप्रसादात कमलावरोहं विप्रप्रसादात ममनाम रामम
भगवान के मुख से ब्राह्मणों की प्रशंसा सुन शान्त हो गई फिर स्नान कराकर सुदामाजी को भोजन कराया सुन्दर पलंग पर शयन कराया तथा भगवान उनके चरण दबाने लगे बहुत दिनों आद भोजन मिलने के कारण उन्हें तुरन्त नींद आ गई भगवान ने ब्रह्मा को बुलाया और पूछा ब्रह्माजी आपने हमारे मित्र के भाग्य में क्या लिखा है ब्रहमा बोले प्रभु सुदामा के भाग्य में लिखा है-श्रीक्षय-भगवान बोले इसे उलट दो ब्रह्मा ने उसे उलटा लिख दिया-यक्षश्री-यानी कुवेर की संपत्ति यद्यपि सामान्य शास्त्र कहते है।
जे विधिना ने लिख दिया छठी रातके अंक
राइ घटे न तिल बढे रहरे जीव निशंक
किन्तु विशिष्ट शास्त्र कहते हैं--
राम नाम मणि विषम व्याल के
मेटत कठिन कुअंक भालके
भगवान भाल के अंक भी बदल देते हैं
प्रात:काल उठते ही सुदामाजी ने घर जाने को कहा भगवान ने उन्हे विदा किया पर कुछ दिया नही अत: वे सोचते जा रहे है--
वह पुलकिन वह उठ मिलन वह आदर की बात
यों पठवनि गोपाल की कछु नही जानी जात
घर-घर में मागत फिरो तनिक छाछ के काज
कहा भयो जो अब भयो हरि को साज समाज
हों तो आवत ना ह तो वाहि पठायो ठेलि
अब कहंगो समझाय के बह घन घरो सकेलि
चलते-चलते आगे देखा कि सुदामापुरी की जगह कोई नगर बसा है उनकी कुटिया का भी पता नहीं इतने में महलों से सोने से लडझड सुशीला उतरी सुदामाजी को प्रणाम कर बोली हमें यह सब भगवान ने दिया है। सुदामाजी बोले सुशीला यह सोना चाँदी मुझे नहीं चाहिए मैं तो बाहर कुटिया बनाकर रहंगा और भजन करूँगा।
इति एकाशीतितमोऽध्यायः
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[ अथ द्वयशीतितमोऽध्यायः ]
भगवान कृष्ण बलराम से गोप गोपियों की भेंट-श्रीशुकदेवजी बोले परीक्षित! एक समय सर्व ग्रास सूर्य ग्रहण हुआ जिसमें भगवान के साथ समस्त यादव कुरु क्षेत्र गए तथा समस्त बृजवासी भी वहाँ आए उधर पाण्डव भी वहाँ आए बहुत दिनों पश्चात सब मिल कर बड़े प्रसन्न हुए सबकी पुरानी यादें ताजा हो गई।
इति द्वयशीतितमोऽध्याय:
[ अथ त्रयशीतितमोऽध्यायः ]
द्रोपदी की पटरानियों के साथ बातचीत-श्रीशुकदेवजी बोले राजन! द्रोपदी भगवान की पटरानियों से मिली तथा उनसे भगवान के साथ विवाह होने की बात पूछने लगी सभी पटरानियों ने अपने-अपने विवाह की कथा द्रोपदी को सुनाई।
इति त्रयशीतितमोऽध्याय:
श्री भागवत महापुराण की हिंदी सप्ताहिक कथा जोकि 335 अध्याय ओं का स्वरूप है अब पूर्ण रूप से तैयार हो चुका है और वह क्रमशः भागो के द्वारा आप पढ़ सकते हैं कुल 27 भागों में है सभी भागों का लिंक नीचे दिया गया है आप उस पर क्लिक करके क्रमशः संपूर्ण कथा को पढ़कर आनंद ले सकते हैं |

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