bhagwat katha in hindi / part-24

bhagwat katha in hindi

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[ अथ त्रिपन्चाशतमोऽध्यायः ]

रुक्मणी हरण-भगवान बोले मैं रुक्मणी की रक्षा करूंगा और अभी आपके साथ चलूगां भगवान ने अपना रथ मगवाकर ब्राह्मण को उसमें बैठाया और आप भी उसमें बैठकर प्रस्थान किया। उधर रुक्मी ने शिशुपाल को लगन भेज दिया और शिशुपाल बहुत बड़ी सेना के साथ कुन्दनपुर को चारों ओर से घेर लिया रुक्मणी के विवाह के उपचार होने लगे किन्तु रुक्मणी न कोई शृंगार कर रही न मेंहदी लगा रही बल्कि भगवान की प्रतिक्षा कर रही हैं। भगवान का रथ जब कुन्दनपुर पहुंचा तो देखाकि कुंदनपुर को शिशुपाल ने चारों ओर से घेर रखा है वे बाहर ही रुक गए और ब्राह्मण को रुक्मणी के पास भेज दिया ब्राह्मण से समाचार सुन रुक्मणी बहुत प्रसन्न हुई और बोली---
आवो सखी आवो मुझे मेंहदी लगादो
मुझे श्याम सुन्दर की दुलहिन बनादो
सत्संग मे मेरी भइ सगाई।
सतगुरु ने मेरी बात चलाई
उनको बुलाके हथलेवा जुडा दो। मुझे।
ऐसी पहनूं चूडी जो कबहुं न टूटे
ऐसा वरुं दुल्हा जो कबहुंन छूटे
अटल सुहाग की बिन्दिया लगादो।मुझे।
ऐसी ओढूं चुनरी जो रंग ना छूटे
प्रीति का धागा कबहु न टूटे
आज मेरी मोतियो से मांग भरादो। मुझे।
भक्ति का सुरमा मैं आंखों मे लगाउगीं
दुनिया से नाता तोड उसकी हो जाउंगी
सतगुरु को बुलाके मेरे फेरे पडवादो। मुझे।
और समस्त शृंगार कर गौरी पूजन के लिए प्रस्थान किया चारों ओर रक्षक चल रहे थे मन्दिर पहुंच कर भगवान का ध्यान करने लगी इतने में भगवान आए और सबके देखते-देखते रुक्मणी को रथ में बैठा कर ले गए जरा संध और शिशुपाल के सैनिक देखते ही रह गए।
इति त्रिपन्चाशतमोऽध्यायः

[ अथ चतुःपन्चाशत्तमोऽध्यायः ]

शिशुपाल के साथी राजाओं की और रुक्मी की हार-श्रीकृष्ण रुक्मणी विवाह श्रीशुकदेवजी वर्णन करते हैं परीक्षित! शिशुपाल ने भगवान का पीछा किया किन्तु यादव सेना ने सबको परास्त कर दिया रुक्मी यह प्रतिज्ञा कर कि मैं रुक्मणी को नहीं लाया तो कुन्दनपुर में प्रवेश नही करुंगा भगवान के पास आए और युद्ध करने लगे भगवान ने उसे पकड कर रथ से बांध लिया दया कर बलरामजी ने उसे छुड़ा दिया वह कुन्दनपुर नहीं गया और वहीं भोजकट गांव बसाकर रहने लगा इस प्रकार भगवान ने रुक्मणी के साथ पाणिग्रहण संस्कार किया।
इति चतुःपन्चाशतमोऽध्यायः

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[ अथ पन्चपन्चाशत्तमोऽध्यायः ]

प्रद्युम्न का जन्म और शम्बासुर का वध-श्रीशुकदेवजी बोले परीक्षित! जब शिवजी ने कामदेव को जलाकर भस्म कर दिया तब रति ने शिवजी से प्रार्थना की तो शिवजी ने बताया कि द्वापर में कृष्ण के पुत्र के रुप मैं तुम्हारा पति जन्म लेगा और शम्बासुर की रसोई में तुम्हें मिलेगा तभी से रति शम्बासुर की रसोई में काम करने लगी उधर रुक्मणी के गर्भ से प्रथम पुत्र के रूप में प्रद्युम्नजी का जन्म हुआ जिसे जन्म ते ही शम्बासुर ले गया ओर समद में फेंक दिया जिसे एक मत्स्य निगल गया मछुवारों ने उसे पकड़कर शम्बासुर की रसोई में दे दिया रसोई में कार्यरत रति ने उसका पेट चीर प्रद्युम्न जी को निकाल लिया बड़े होने पर प्रद्युम्नजी ने शम्बासुर को मार रति से विवाह कर द्वारका आ गए।

इति पन्चपन्चाशत्तमोऽध्यायः

[ अथ षट्पन्चाशत्तमोऽध्यायः ]

स्यमन्तक मणि की कथा जाम्बवन्ती और सत्यभामा के साथ श्रीकृष्ण का विवाह-श्रीशुकदेवजी बोले परीक्षित्! सत्राजित नाम का एक यादव सूर्य का भक्त था उसने सूर्य से एक मणि प्राप्त की थी जिसे गले में पहिन एक दिन वह भगवान कृष्ण के पास गया वहाँ अन्य यादव भी बैठे थे मणि देख वे सब बोले यह मणि भगवान के गले में कितनी सुन्दर लगेगी सत्राजित को लगा कि ये सब उसकी मणि को लेने में है वहां से वह उठकर चला गया वहाँ से उसका भाई प्रसेन मणि को पहन शिकार के लिए वन में चला गया जिसे एक शेर ने मार दिया जब प्रसेन नहीं लौटा तो सत्राजित को संदेह हो गया कि उसके भाई को कृष्ण ने मरवाकर मणि ले ली यह बात चारों ओर फैल गई तब तो भगवान कुछ मुख्य यादवों को साथ लेकर मणि को खोजने निकले जंगल में प्रसेन और उसका घोड़ा मरा हुआ मिला इसे एक शेर ने मार दिया शेर के पद चिह्नों को लेकर चले तो वह शेर भी कुछ दूरी पर मरा हुआ मिला लेकिन मणि वहाँ भी नही मिली उसे मारने वाला कोई रीछ था उसके पद चिह्नों को लेकर चले तो वह रीछ एक गुफा में घुस गया भगवान ने देखाकि गुफा में कोई खतरा हो सकता है अत: सब यादवों को गुफा के बाहर छोड़ अकेले गुफा में प्रवेश किया वहाँ देखा कि मणि से एक बालिका खेल रही है पास ही रिक्षराज जाम्बवन्त खड़ा है भगवान बोले रिक्षराज यह मणि हमारी है जाम्बवन्त बोले इसे मैं युद्ध में जीत कर लाया हूं यदि यह आपकी है तो युद्ध में जीत कर ले जावे भगवान जाम्बवन्त के साथ युद्ध करने लगे और अन्त में उसे परास्त कर दिया जाम्बवन्त भगवान को पहिचान गए और उनके चरणों में गिर गए और अपनी जाम्बवन्ती कन्या उन्हें समर्पित कर दी साथ में मणि उसके गले में डालदी भगवान गुफा से बाहर आए जहाँ यादव लोग उनकी प्रतिक्षा कर रहे थे भगवान ने सबको मणि दिखादी और जाम्बवंती के विवाह की बात भी बता दी सबने जाकर मणि सत्राजित को दें दी। सत्राजित बहुत लज्जित हुआ अत: उसने अपनी सत्यभामा नामकी कन्या भगवान को ब्याह दी और वह मणि भगवान को दहेज में देना चाहा किन्तु भगवान ने नहीं ली।

इति षट्पन्चाशत्तमोऽध्यायः

[ अथ सप्तपन्चाशत्तमोअध्यायः ]


स्यमन्तक हरण शतधन्वा उद्धार अक्रूरजी को फिरसे द्वारका बुलाना-श्रीशुकदेवजी बोले जब मणि सत्राजित को मिल गई तब कृतवर्मा और अक्रूरजी शतधन्वा से जाकर बोले देखो सत्राजित ने तुम्हारे साथ कितना बड़ा धोखा किया है सत्यभामा जो तुम्हे देने जा रहे थे उसे उसने कृष्ण को दे दी तुम उसे मार कर मणि प्राप्त करलो शतधन्वा ने उनके कहने में आकर सोते हुए सत्राजित को मारकर मणि लेली किन्तु कृष्ण के भय से मणि अक्रूरजी की तरफ फेंक कर धोड़े पर सवार हो वहाँ से भग गया जब भगवान को इस बात का पता चला तो सत्यभामाजी को ढाढ़स बंधा वे शतधन्वा के पीछे भगे और मिथिलापुरी के नजदीक शतधन्वा को मार गिराया पर उसके पास मणि नहीं मिली भगवान द्वारकापुरी लौट आये शतधन्वा के मारे जाने की खबर सुन भय से अक्रूरजी और कृतवर्मा भी द्वारका छोड़ भग गए भगवान ने अक्रूरजी को ढुढ़वाया और मणि के बारे में पूछा अक्रूरजी ने सब के सामने मणि मेरे पास है सबको बता दिया इस प्रकार भगवान ने अपना कलंक दूर किया।
इति सप्तपन्चाशत्तमोऽध्यायः

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[ अथ अष्टपन्चाशत्तमोऽध्यायः ]

श्रीकृष्ण के अन्यान्य विवाहों की कथा-श्रीशुकदेवजी कहते हैं परीक्षित! एक समय भगवान कृष्ण हस्तिना पुर गए वहां वे अर्जुन के साथ यमुना किनारे भ्रमण कर रहे थे वहां एक सुन्दर कन्या तपस्या कर रही थी अर्जुन ने उससे पूछा कि आप कौन हैं उसने बताया कि मैं कालिन्दी हूं भगवान को पति रूप में प्राप्त करना चाहती हूं भगवान ने उसे अपने रथ में बैठा लिया और द्वारका आकर उसके साथ विवाह किया इसके पश्चात् उज्जैन देश के राजा विन्द की कन्या मित्रविन्दा भगवान को पति रूप में चाहती थी। भगवान ने उसका हरण कर उसके साथ विवाह किया। कौशल देश के राजा नग्नजित् की कन्या नाग्नजिती का विवाह भगवान ने सात बैलों को एक साथ नाथ पहनाकर कर लिया। कैकय देश के राजा की कन्या भद्रा का विवाह उसके भाईयों ने भगवान के साथ कर दिया। मद्रदेश के राजा की कन्या लक्ष्मणा का भी भगवान ने स्वयम्बर से हरण कर उसके साथ विवाह किया इस प्रकार ये भगवान की आठ पटरानियों के विवाह हुए।

इति अष्टपन्चाशत्तमोऽध्यायः

[ अथ एकोनषष्टितमोऽध्यायः ]

भोमासुर का उद्धार, सोलह हजार एक सौ कन्याओं के साथ भगवान का विवाह-श्रीशुकदेवजी बोले परीक्षित्! भोमासुर नाम के राक्षस ने वरुण का छत्र इन्द्र की माता अदिति के कुण्डल हरण कर लिए तथा सोलह हजार एक सौ कन्याओं को बन्दी बना रखा था। अत: इन्द्र भगवान के पास गया और कहा प्रभु यह राक्षस देवताओं को बहुत सता रहा है तब भगवान ने गरुड़ पर सवार होकर सत्यभामाजी के साथ उसे मारने के लिए प्रस्थान किया उसका किला बड़ा मजबूत था जिसे तोड़कर भगवान ने उस राक्षस को मार सोलह हजार एक सों कन्याओं को मुक्त किया वे सबकी सब भगवान को पति रूप में चाहती थी उनका अभिप्राय जान भगवान ने सब को द्वारका भेज दिया और आप सीधे अमरावती गए इन्द्र की माता अदिति के कुण्डल देकर इन्द्र को परास्त कर एक कल्प वृक्ष लेकर द्वारका आगए और वहां आकर सोलह हजार एक सौ कन्याओं के साथ विवाह किया।
इति एकोनषष्ठितमोऽध्यायः

[ अथ षष्टित्तमोऽध्यायः ]

श्रीकृष्ण रुक्मणि संवाद-श्रीशुकदेवजी बोले परीक्षित् एक बार भगवान श्रीकृष्ण रुक्मणि जी के महलों में पधारे और उनसे कुछ मनोरंजन करने लगे कहने लगे देवी शिशुपाल सरीखे योद्धाओं को छोड़ तुमने मेरे साथ विवाह कर बहुत बड़ी गलती की शायद तुम उसके लिए पश्चाताप भी कर रही होंगी तो मैं कहता हूँ अभी भी समय है तुम उन्हें प्राप्त करने में स्वतन्त्र हो भगवान के मुख से ऐसी वाणी सुन रुक्मणि बेहोश होकर गिर गई भगवान उन्हे पंखा झलने लगे होश आने पर कहा अरे रुक्मणि मैं तो तुमसे मनोरंजन कर रहा था।

इति षष्टितमोऽध्यायः

[ अथ एकषष्टित्तमोअध्यायः ]

श्रीशुकदेवजी कहते हैं परीक्षित्! भगवान की सोलह हजार एक सौ आठ महारानियों के प्रत्येक के गर्भ से दस-दस पुत्र उत्पन्न हुए रुक्मणीजी के भाई रुक्मी की पुत्री रुक्मवती ने स्वयम्बर में प्रद्युम्नजी के गले में वरमाला डाल दी उपस्थित राजाओं ने इसका विरोध किया तब सबको जीत कर रुक्मवती का हरण कर लाए।रुक्मी ने अपनी बहिन को प्रसन्न कर पुराने बैर को मिटाने के लिए प्रद्युम्नजी को अपनी बेटी ब्याह दी तथा अपनी पोत्री अनिरुद्धजी को ब्याह दी अनिरुद्धजी के विवाह में बलरामजी व रुक्मी में विवाद हो गया रुक्मी चासर के खेल में बईमानी करने लगा तो बलरामजी ने रुक्मी का वध कर दिया।
इति एकषष्टित्तमोऽध्यायः

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[ अथ द्विषष्टितमोऽध्यायः ]

उषा अनिरुद्ध मिलन-श्रीशुकदेवजी वर्णन करते है कि बलि का पुत्र बाणासुर ने शिवजी की भक्ति कर उनसे वरदान में एक हजार भुजाएं प्राप्त की थी बल प्राप्त कर वह शिवजी से ही युद्ध करने को उद्यत हो गया इस पर शिवजी ने कहा तेरे महल की ध्वजा जिस दिन गिर जावे उस दिन तुमसे युद्ध करने वाला आ जावेगा। बाणासुर के एक कन्या थी उषा उसने स्वप्न में अनिरुद्ध को देख लिया और उन्हें अपना ह्रदय दे दिया जगने पर वह अपनी सहेली चित्रलेखा से बोली सखी स्वप्न में एक पुरुष मेरे मन को चुरा ले गया चित्रलेखा ने बडे-बडे नरपतियों के चित्र बनाए उनमें वह अनिरुद्धजी को पहिचान गई चित्रलेखा ने अपनी माया से सोते हुए अनिरुद्धजी को पलंग सहित उषा के महलों में पहुँचा दिया उषा उनके साथ बिहार करती रही प्रात: होते ही पुन: उन्हें द्वारका पहुँचा दिया इस प्रकार कई दिनों यह क्रम चलता रहा एक दिन बाणासुर को इसका पता चल गया उसने अनिरुद्धजी को बंदी बना लिया।

इति द्विषष्टितमोऽध्यायः

[ अथ त्रिषष्टितमाऽध्यायः ]


श्रीशुकदेवजी वर्णन करते है परीक्षित्! भगवान को मालुम होने पर भगवान ने बाणासुर पर चढाई कर दी दोनों ओर से युद्ध होने लगा बाणासुर की ओर से शिवजी तथा उनका परिवार भी युद्ध में आ गया एक ओर नारायणी सेना तो दूसरी ओर बाणासुर और शिवसेना में घोर युद्ध होने लगा नारायणी सेना के सामने शिवसेना टिक नहीं पाई वह भाग खड़ी हुई अपनी सेना को भागती देख शिवजी ने एक ज्वर छोड़ा वह दौड़ता हुवा भगवान की ओर आया भगवान ने भी एक ज्वर छोड़ा जिसने माहेश्वरी ज्वर को पछाड़ दिया वह रोता हुआ भगवान के पास आया और प्रार्थना करने लगा भगवान ने बाणासुर की हजार भुजाएं काट दी अन्त में शिवजी के कहने से बाणासुर ने अपनी कन्या उषा अनिरुद्धजी को ब्याह दी और मुक्त कर दिया।
इति त्रिषष्टितमोऽध्यायः

[ अथ चतुःषष्टितमोऽध्यायः ]

नृगराजा की कथा-श्रीशुकदेवजी वर्णन करते हैं परीक्षित्! एक दिन भगवान के पुत्र साम्ब आदि एक उपवन में खेल रहे थे वहाँ एक सूखे कुएँ में एक बड़ा चमकीला गिरगिट देखा पहले तो उन्होंने उसे निकाल ने की कोशिश की जब नहीं निकला तो उन्होंने यह बात भगवान को बताई भगवान ने उसे अपने धनुष की नोक से बाहर निकाल लिया भगवान का स्पर्श होते ही वह । एक सुन्दर पुरुष बन गया पहले तो उसने भगवान को प्रणाम किया फिर बोला प्रभो मैं इक्ष्वाकु पुत्र नृग हूँ मैं नित्य एक लाख गायों का दान करता था एक दिन एक दान की हुई गाय मेरी गायों में पुन: आ गई जिसे मैंने दूसरे ब्राह्मण को दान कर दी दोनों ब्राह्मण झगड़ते हुए मेरे पास आए मैंने उन्हें उस गाय के बदले एक लाख गायें देने तक को कहा किन्तु दोनों ही उसे छोड़कर चले गए अन्त समय में धर्मराज ने मुझे पाप पुण्य में से एक पहले भोगने को पूछा मैंने पहले पाप को भोग लेना उचित समझा अत: मैं गिरगिट बन गया अब आपके स्पर्श से मैं पाप मुक्त हो गया हूँ।

इति चतुःषष्टितमोऽध्यायः

[ अथ पन्चषष्टितमोऽध्यायः ]

बलरामजी का बृजगमन-श्रीशुकदेवजी बोले एक समय बलराम जी बृज में गए वहाँ नन्द बाबा आदि से मिले अपने सुहृद जनों से मिलकर उन्हें आनन्दित किया रास के समय उन्होंने यमुनाजी को बुलाया नहीं आने पर उसे हल की नोक से खेंच लिया सबसे मिल जुलकर वे वापिस द्वारका आ गए।

इति पन्चषष्टितमोऽध्यायः

[ अथ षट्षष्टितमोअध्यायः ]

पौण्ड्रक और काशीराज का उद्धार-श्रीशुकदेवजी बोले एक समय करुष देश का राजा पौण्ड्रक अपने मित्र काशीराज के यहाँ ठहरा था ने द्वारका में भगवान के पास एक दूत भेजा और कहा तुम मिथ्या वासुदेव हो असली वासुदेव तो मैं हूँ तुम बृथा शंखचक्र आदि छोड़ दो अन्यथा हमसे युद्ध करो भगवान ने काशी पर चढाई कर काशीराज सहित पौण्ड्रक को समाप्त कर दिया।

इति षट्षष्टितमोऽध्यायः

[ अथ सप्तषष्टितमोऽध्यायः ]

द्विविदका उद्धार-श्रीशुकदेव बोले एक त्रेता युग का भगवान राम की सेना का वानर जो भोमासुर का मित्र था भोमासुर के मर जाने के बाद विप्लव पर उतारू हो गया गांवों को नष्ट करने लगा भगवान बलराम जी ने उसे भी समाप्त कर दिया।

इति सप्तषष्टितमोऽध्यायः

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[ अथ अष्टषष्टितमोऽध्यायः ]

कौरवों पर बलरामजी का कोप और साम्ब का विवाह- श्रीशुकदेवजी बोले एक समय भगवान के पुत्र साम्बजी ने स्वयम्बर में दुर्योधन की पुत्री लक्ष्मणा का हरण कर लिया कौरवों ने पीछाकर उसे पकड़ लिया और बन्दी बना लिया बलरामजी ने हल की नोक से जब हस्तिनापुर खेंच कर नष्ट करना चाहा तभी दुर्योधन उनके चरणों में गिर गया और साम्बजी का विवाह लक्ष्मणा के साथ कर दिया।
इति अष्टषष्टितमोऽध्यायः

[ अथ एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ]

नारदजी का भगवान की गृहचर्या देखना-श्रीशुकदेवजी बोले एक दिन नारदजी के मन में आया कि भगवान सोलह हजार एक सौ आठ महलों में कब कैसे रहते है देखने गए वे पहले रुक्मणि के महलों में गए जहाँ भगवान दतवन कर रहे थे सत्यभामाजी के यहाँ स्नान कर रहे थे जाम्बवन्तीजी के यहां वस्त्र पहन रहे थे ऐसे सब जगह अलग-अलग दिन चर्या देख नारदजी बड़े आनंदित हुए।
इति एकोनसप्तितमोऽध्यायः

[ अथ सप्ततितमोऽध्यायः ]


जरासंध के कैदी राजाओं के दूत का आना-श्रीशुकदेवजी बोले राजन् एक दिन जब भगवान अपने प्रात: कालीन संध्यादि नित्य कर्मों से निवृत्त हुए ही थे कि जरासंध ने जिन अस्सी राजाओं को बलि के लिए बन्दी बना रखे थे उनका एक दूत भगवान के पास आया और बोला प्रभो मैं जरासंध के यहाँ बन्दी राजाओं का भेजा हुआ दूत हूँ आप उनकी प्रार्थना पर ध्यान दें जरासंध को मार उन्हें बन्दी से छुडावें दूत को राजाओं को मुक्त कराने का आश्वासन दे विदा किया। इतने में नारदजी आ गए और उन्होंने पाण्डवों की राजसूय यज्ञ की इच्छा से भगवान को अवगत कराया और कहा प्रभो उनकी इच्छा है कि इस कार्य को आप चलकर सम्पन्न करावें।

इति सप्ततितमोऽध्यायः

[ अथ एकसप्ततितमोऽध्यायः ]

भगवान का इन्द्रप्रस्थ पधारना-श्रीशुकदेवजी कहते है नारदजी के कथनानुसार तथा उद्धवजी के समर्थन के अनुसार भगवान ने इन्द्रप्रस्थ के लिए प्रस्थान किया और वहाँ पहुँच कर पाण्डवों को आनन्दित किया।
इति एकसप्ततितमोऽध्यायः

[ अथ द्विसप्ततितमोऽध्यायः ]

श्रीशुकदेवजी वर्णन करते है कि इन्द्रप्रस्थ में पाण्डवों ने भगवान के साथ विचार कर राजसूय यज्ञ का निर्णय किया किन्तु भगवान बोले जरासंध यज्ञ में बाधक है अत: पहले जरासंध को समाप्त किया जाय भगवान के कथनानुसार अर्जुन भीम और स्वयं भगवान ब्राह्मण वेश में प्रात:काल जरासंध के द्वार पर पहुंचकर उससे द्वन्द युद्ध की भिक्षा माँगी उसने भीम के साथ युद्ध करने को कहा भीम के साथ सत्ताइस दिन तक युद्ध होता रहा लेकिन जरासंध जीतने में नही आया अन्त में भगवान को याद आया कि यह दो माताओं से दो भागों में जन्मा था जरा राक्षसी ने इसे जोड़ दिया इसमें जीवन का संचार हो गया अत: भगवान ने भीम को उसे बीच में से चीरकर दो भाग करने का संकेत किया भीम ने वैसा ही कर उसे मार दिया।

इति द्विसप्ततितमोऽध्यायः


श्री भागवत महापुराण की हिंदी सप्ताहिक कथा जोकि 335 अध्याय ओं का स्वरूप है अब पूर्ण रूप से तैयार हो चुका है और वह क्रमशः भागो के द्वारा आप पढ़ सकते हैं कुल 27 भागों में है सभी भागों का लिंक नीचे दिया गया है आप उस पर क्लिक करके क्रमशः संपूर्ण कथा को पढ़कर आनंद ले सकते हैं |

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