[ अथ त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ]
कुवललिया पीड का उद्धार और अखाड़े में प्रवेश-प्रात: काल होते ही सब लोग अखाडों पर जमा होने लगे कृष्ण बलराम भी अखाडे की ओर चल दिए मथुरावासी सब भगवान की प्रशंसा कर रहे थे और भगवान के दर्शन कर धन्य हो रहे थे जब भगवान अखाडे के मुख्य द्वार पर पहुंचे तो देखा एक विशाल काय हाथी द्वार पर खडा है भगवान ने महावत से कहा हाथी को हटावो ताकि हम भीतर जावें महावत बोला हमने तो सुना है तम कई हाथियों का बल रखते हो इस हाथी को नहीं हटा सकते भगवान ने हाथी की पूछ पकड़ कर पहले तो कुछ समय खेल किया फिर सूंड पकड़कर घुमाकर भूमि पर पछाड़ दिया और अखाडे में प्रवेश किया तो चाणूर और मुष्टिक ने उनसे कहा आवो तुम हमारे साथ मल्लयुद्ध करो भगवान बोले हम तो किशोर बालक हैं आप महान योद्धा युद्ध तो बराबर वालों के साथ होता है चाणूर बोले जानते है आप मल्लोके मल्ल हैं अभी-अभी आपने दस हजार हाथियों का बल रखने वाले कुवलिया पीड हाथी को मारा है।
इति त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः
bhagwat katha in hindi
[ अथ चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ]
चाणूर मुष्टिक और कंस का उद्धार-श्रीशुकदेवजी वर्णन करते है कि चाणूर और मुष्टिक की बात सुन कर पहले मुष्टिक के साथ बलरामजी भिड़ गए दर्शकों को प्रसन्न करने के लिए पहले कई दावोंपेच दिखाए और अन्त में मुष्टिक को उठाकर ऐसा पटका कि उसके प्राणान्त हो गए। अब तो चार के साथ भगवान का द्वन्द युद्ध प्रारम्भ हआ उसी प्रकार दर्शकों को लुभाने के लिए अनेक खेल खेलने लगे कभी वे गिर जाते तो कभी उसे गिरा देते दर्शक वाह वाह कर रहे थे अन्त में चार को उठाकर भूमिपर दे मारा वह समाप्त हो गया कंस बड़बड़ाने लगा दोनों भाइयों को पकड लो बज वासियों को बन्दी बना लो तब तक भगवान कंस के उंचे मंच पर जा चढे और कंस के केश पकड़कर मंच से नीचे कूद गए और उसकी छाती पर बैठ और बोले तूने मेरी माँ के केश खेंचकर रथ से नीचे गिराया था न कंस की छाती में एक घूसा जमाया कि उसके प्राणान्त हो गए सारे राक्षस भाग गए भगवान ने पहले उग्रसेनजी को जेल से रिहा किया फिर अपने माता पिता को बन्दी से छुड़ाया नानाजी को राज्य दे कंस का अन्तिम संस्कार किया।
इति चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः
[ अथ पञ्चचत्वारिंशोअध्यायः ]
श्रीकृष्णबलराम का यज्ञोपवीत संस्कार और गुरुकुल प्रवेश-श्रीशुकदेवजी वर्णन करते है कि इस समय भगवान बारहवें वर्ष में चल रहे थे क्षत्रियों का यज्ञोपवीत संस्कार बारह वर्ष तक हो जाना चाहिए अत: उनका यज्ञोपवीत संस्कार कराकर उन्हें उज्जैन मे सांदीपन गुरु के यहां भेज दिए गए वहां उन्होंने अल्प काल में सब विद्या पढ़ ली और गुरु के मरे हुए पुत्र को लाकर गुरु दक्षिणा दी।
इति पंचचत्वारिंशोअध्यायः
[ अथ षट्चत्वारिंशोअध्यायः ]
उद्धव की ब्रजयात्रा-श्रीशुकदेवजी वर्णन करते हैं राजन् एक दिन भगवान को ब्रज की याद आइ इतने में उद्धवजी आ गए भगवान को चिन्तन मग्न देख वे बोले प्रभो आपका मन कहीं अन्यत्र है खोये खोये क्यों हैं तब भगवान बोले
उधो ब्रज बिसरत मोहि नाहीं
हस सुता की सुन्दरकलरव अरु तरुवन की छायीं
वे सुर भी वे बच्छ दोहनी खिरक दुहावन जाहीं
ग्वालबाल सब करत कोलाहल नाचत गहगह बाही
यह मथुरा कंचन की नगरी मणिमुक्ता जिन माही
जबहि सुरतआवतवा सुख की जिय उमगत सुखनाही
अगणित भांति करीबहु लीला यशोदानन्द निवाई
सूरदास प्रभुरहे मौन हवे यहकह कह पछिताई
भगवान बोले उद्धव ब्रज वसियों को समझाने ब्रज जावो उद्धवजी ब्रज में संध्या को पहुंचे नन्द बाबा ने उनका स्वागत किया और कुशल पूछी उन्हें भोजन कराया और विश्राम किया।
इति षट्चत्वारिंशोऽध्याय
[ अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ]
उद्धव गोपी संवाद-श्रीशुकदेवजी वर्णन करते है प्रात: होते ही जब गोपियों ने देखाकि नन्द बाबा के यहां एक रथ खड़ा है भगवान आए हैं ऐसा सोच सब गोपियां वहां आ गई जब देखा कि भगवान नही उनके सखा आए हैं सबने उनको घेर लिया और उनसे भगवान के समाचार पूछे,
उद्धवजी बोलेसुनो गोपी हरिको संदेश
करिसमाधि अन्तरगति ध्यावहु यह उनको उपदेश
वहअविगत अविनाशी पूरण सब घट रह्यो समाई
निर्गुण ज्ञान बिन मुक्ति नहोवे वेद पुरणन गाई
सगुण रूप तजि निर्गुण ध्यावो इक चित इकमन लाई
यह उपाय करि विरह तजो तुम मिले ब्रह्म तव आई
दुसह सुनत संदेश माधव को गोपीजन बिलखानी
सूर विरह की कौन चलावे डूबत हैं बिनु पानी
उद्धवजी का एसे संदेश सुन गोपियां बोली
उधो मन न भए दसबीस
एक हुतो सो गयो श्याम संग को अवराधे इश
इन्द्रिय शिथिल भाइ केशव बिन ज्यों देही बिन शीश
आशा लगी रहत तन खासा जीवो कोटि बरीश
तुमतो सखा श्यामसुन्दर के सकल जोग के इश
सूरदास वा सुख की महिमा जा पूछो जगदीश
ब्रज गोपियों के ऐसे प्रेम भरे वचन सुन उद्धव गद गद हो गए और बोले इन ब्रज गोपियों के चरण धूलि को प्रणाम करता हूं गोपियां और नन्द बाबा से आज्ञा ले वे मथुरा आ गए।
इति सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः
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[ अथ अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ]
भगवान का कुब्जा और अक्रूरजी के घर जाना-श्रीशुकदेवजी बोले भगवान ने अक्रूरजी से जब वे ब्रज से मथुरा लाए थे वायदा किया था कि वे अक्रूरजी के घर आयेगें तो भगवान अक्रूरजी के घर पहुंचे अक्रूरजी ने उनका बड़ा सत्कार किया और कहा प्रभु मैं आपको भूलूं नहीं ऐसी कृपा करें। भगवान वहां से कुब्जा के घर भी पहुंचे और उसका मनोरथ सिद्ध किया।
इति अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः
[ अथ एकोनपंचाशत्तमोऽध्यायः ]
अक्रूरजी का हस्तिनापुर जाना-श्रीशुकदेवजी वर्णन करते है कि एक बार भगवान ने अक्रूरजी को यह जानने के लिए कि पाण्डु की मृत्यु के बाद धृतराष्ट्र पाण्डु पुत्रों के साथ कैसा व्यवहार करता है हस्तिनापुर भेजा था जब अक्रूरजी ने वहां देखाकि पाण्डवों के साथ धृतराष्ट्र का व्यवहार ठीक नही है यह जानकारी आकर भगवान को दें दी।
इति एकोनपंचाशत्तमोऽध्यायः
इति दशम स्कन्ध पूर्वार्ध समाप्त
अथ दशम स्कन्ध उत्तरार्ध
[ अथ पन्चाशत्तमोऽध्यायः ]
जरासन्ध से युद्ध और द्वारकापुरी का निर्माण-श्रीशुकदेवजी वर्णन करते है कि परीक्षित्! कंस की दो रानियाँ थी अस्ति और प्राप्ति ये कंस के मरजाने के बाद अपने पिता जरासंध के पास गई और बोली पिताजी हमें कृष्ण ने विधवा बना दिया यह सुन जरासंध ने तेबीस अक्षोहिणि सेना लेकर मथुरा को चारों ओर से घेर लिया भगवान ने भी इस बहाने दुष्टों का संहार करने का मानस बनाया और बलरामजी के साथ मथुरा से बाहर निकल जरासंध से युद्ध करने लगे बलरामजी ने हल मुसल से जरासंध की सारी सेना का संहार कर दिया और जरासंध को पकड़ लिया उसे मारने ही वाले थे कि भगवान ने उन्हें रोक दिया और कहा दादा अभी यह और दुष्टों को लेकर आयेगा अत: सब दुष्टों को मारने के बाद ही इसे मारेगें बलरामजी ने उसे छोड़ दिया वह फिर सत्रह बार तेबीस-तेबीस अक्षोहिणि सेना लेकर आया और कृष्ण-बलराम ने सेना का सफाया कर जरासंध को छोड़ दिया अठारहवीं बार जरासंध ने कालयवन के साथ मथुरा पर चढाई की अब की बार भगवान ने विश्वकर्मा के सहयोग से समुद्र के बीच द्वारकापुरी का निर्माण कर वहाँ समस्त मथुरा वासियों को भेज दिया।
[ अथ एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ]
कालयवन का भस्म होना मुचुकुन्द की कथा-श्रीशुकदेवजी वर्णन करते है परीक्षित! मथुरा वासियों को द्वारका भेज दोनों भाई कृष्णबलराम मथुरा से बाहर आए कालयवन भगवान को देखते ही पहिचान गए कि यही कृष्ण है मैं इसी के साथ युद्ध करूगाँ और वह भगवान की ओर दौडा किन्तु भगवान उसका मुकाबला न कर पीछे मुड़कर भागने लगे कालयवन भी उनके पीछे भागने लगा भगवान एक गुफा में घुस गए वहां त्रेतायुग के राजा मुचुकुन्द सो रहे थे उस पर अपना डुपटा डाल भगवान आगे बढ़ गए जब कालयवन वहाँ पहुँचा तो दुपटा देख कृष्ण समझ कर बुरा भला कहने लगा मुचुकुन्द जग गए उनके देखते ही कालयवन जलकर भस्म हो गया मुचुकुन्द त्रेता में देवासुर संग्राम मे देवताओं की विजय करा कर सोये थे उन्हें यह वरदान था कि जो उन्हें जगाएगा जलकर भस्म हो जायेगा कालयवन के भस्म होते ही भगवान ने मुचुकुन्द को दर्शन दिया और उसे मुक्त कर भगवान ने उसे अगले जन्म में ब्राह्मण बनकर मुझे प्राप्त करोगें ऐसा वरदान
एकपन्चाशतमोऽध्याय
[ अथ द्विपन्चाशत्तमोऽध्यायः ]
द्वारका गमन बलरामजी का विवाह रुक्मणीजी का सन्देश लेकर ब्राह्मण का आना-श्रीशुकदेवजी बोले परीक्षित! भगवान ने जब बाहर आकर देखाकि जरासंध भी आ गया है और वह बलरामजी की तरफ दौड़ रहा है भगवान ने बलरामजी को संकेत किया और वे भी युद्ध छोड़ भाग खड़े हुए और दोनों भाई दौड़कर प्रवर्षण पर्वत पर चढ़ गए जरासंध ने पर्वत के चारों ओर आग लगा दी और समझ लिया कि वे दोनों भाई जल कर भस्म हो गए। भगवान ने वहाँ से छलांग लगाकर दोनों भाई द्वारका आ गए और आनंद से रहने लगे अब कृष्ण बलराम पूरे पच्चीस वर्ष के हो गए अतः भगवान ने विवाह का मानस बनाया पहले बलरामजी के विवाह के लिए रेवत राजा अपनी रेवती कन्या को ब्रह्माजी की आज्ञा से लेकर आया और उसका विवाह बलरामजी के साथ कर दिया।
राजाअअसीद भीष्मको नाम विदर्भाधिपतिर्महान्
तस्य पन्चाभवन् पुत्राः कन्यका च वरानना।
रुक्म्यग्रजो रुक्मरथो रुक्मबाहुरनन्तरः
रुक्मकेशो रुक्ममाली रुक्मण्येषां स्वसा सती।।
शुकदेवजी वर्णन करते हैं कि विदर्भ देश के राजा भीष्म के पांच पुत्र और एक कन्या रुक्मणी थी रुक्मणी ने श्रीकृष्ण के गुणों को सुन रखा था अत: उसने मन ही मन उन्हें अपने पति रूप में स्वीकार कर लिया लेकिन उसका बड़ा भाई रुक्मी उसे शिशुपाल को देना चाहता था यह जान रुक्मणी ने एक ब्राह्मण को पत्रिका लिखकर श्रीकृष्ण के पास द्वारका भेजा। ब्राह्मण पत्रिका लेकर द्वारकापुरी पहुंचा और भगवान को रुक्मणी जी की पत्रिका ले जाकर दी और कहा प्रभो रुक्मणी को उसका भाई रुक्मी शिशुपाल को देना चाहता है जबकि रुक्मणी आपको चाहती है अत: चलकर रुक्मणी की रक्षा करें और आपका आदेश मुझे बताए।
इति द्विपन्चाशतमोऽध्यायः
श्री भागवत महापुराण की हिंदी सप्ताहिक कथा जोकि 335 अध्याय ओं का स्वरूप है अब पूर्ण रूप से तैयार हो चुका है और वह क्रमशः भागो के द्वारा आप पढ़ सकते हैं कुल 27 भागों में है सभी भागों का लिंक नीचे दिया गया है आप उस पर क्लिक करके क्रमशः संपूर्ण कथा को पढ़कर आनंद ले सकते हैं |

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