bhagwat katha in hindi / part-22

bhagwat katha in hind

दशम स्कंध कि कथा
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[ अथ त्रयोविंशोऽध्यायः ]

यज्ञपत्नियों पर कृपा-श्रीशुकदेवजी वर्णन करते है एक बार सभी ग्वाल बालों को बडी जोर से भूख लगी वे भगवान से बोले कन्हैया जोर की भूख लगी है तब भगवान उनसे बोले यहां से थोडी दूर पर वेदवादी ब्राहमण आंगि रस नामक यज्ञ कर रहे हैं आप उनके पास जाकर भोजन ले आवो ग्वाल बाल गए और उनसे भोजन की याचना की किंतु उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया फिर भगवान ने उन्हे ब्राह्मण पत्नियों के पास भेजा भगवान का नाम सुनते ही वे दौड़ पडी हाथों में भोजन के थाल ले लेकर भगवान के पास पहुँची बड़े प्रेम से भगवान को जिमाया और कृतकृत्य हो गई,,
इति त्रयोविंशोऽध्यायः

[ अथ चतुर्विंशोऽध्यायः ]

इन्द्र यज्ञ निवारण-श्रीशुकदेवजी वर्णन करते हैं एक दिन सब बृजवासी गोवर्धन पूजा की तैयारी कर रहे थे तभी भगवान ने नन्दादि गोपों से पूछा आप ये सब काहे की तैयारी कर रहे हैं जब वे लोग बोले कन्हैया हम प्रति वर्ष वर्षा करने वाले देवता इन्द्र की पूजा किया करते है इसकी तैयारी हम कर रहे हैं भगवान बोले बाबा गरमी में जल वाष्प बन कर उड़ता है वहीं वर्षा होती है फिर हम बृज वासियों का तो इन्द्र गोवर्धन है इसी की पूजा होनी चाहिए सब बृजवासी इससे सहमत हो । गए और जो सामग्री इन्द्र के लिए बनाई थी उससे गोवर्धन की पूजा की।
इति चतुर्विंशोऽध्यायः

[ अथ पञ्चविंशोऽध्यायः ]

गोवर्धन धारण-श्रीशुकदेवजी कहते हैं जब इन्द्र की पूजा मेट कर गोवर्धन की पूजा की गई है ऐसा ज्ञान जब इन्द्र को हुआ तो वह बड़ा क्रोधित हुआ ओर बज पर भयंकर वर्षा प्रारंभ कर दी बृज डूबने लगा तब घबरा कर बृजवासी भगवान की शरण आये भगवान ने गोवर्धन पर्वत को उठाकर सब बृज को उसके नीचे ले लिया चारों ओर शेषजी घेरा डाल कर बैठ गए न बाहर का पानी आया न ऊपर का सात दिन तक मूसला धार वर्षा होती रही फिर भी बृज को सुरक्षित देख इन्द्र घबराया वह भगवान की शरण आ गया उनकी पूजा कर उनसे क्षमा याचना की।
इति पञ्चविंशोऽध्यायः

[ अथ षड्विंशोऽध्यायः ]

नन्दबाबा से गोपों की कृष्ण के प्रभाव के विषय में बातश्रीशुकदेवजी वर्णन करते हैं भगवान श्री कृष्ण के ऐसे अद्भुत चरित्र देख बजवासी नन्दबाबा से कहने लगे बाबा आपका यह बालक साधारण नहीं है देखो इसने पूतना को मारा शकटासुर तृणावर्त को पछाडा उखल से दोनो वृक्षों को उखाड़ दिया बकासुर, अघासुर को समाप्त किया और अभी विशाल गोवर्धन उठा लिया इस पर नन्दबाबा बोले तुम्हे एक बात बताउं गर्गाचार्य ने कहा था कि यह साक्षात् परमात्मा का अवतार है।
इति षड्विंशोऽध्यायः

[ अथ सप्तविंशोऽध्यायः ]

श्रीकृष्ण का अभिषेक-श्रीशुकदेवजी वर्णन करते हैं इन्द्र भगवान के ऐश्वर्य को समझ स्वर्ग से काम धेनु को लेकर आया और काम धेनु ने भगवान का अभिषेक किया इन्द्र भगवान की प्रार्थना करने लगा प्रभो हम जैसे तुच्छ लोग आप को पहिचान नहीं सकते आप की महिमा अपार है मैं अहन्कार में चूर था आपने मुझे शिक्षा दी मैं धन्य हो गया। भगवान बोले इन्द्र तुम मुझे भूल गए थे अब मुझे कभी नहीं भूलना।
इति सप्तविंशोऽध्यायः

[ अथ अष्टाविंशोऽध्यायः ]

वरुण लोकसे नन्दजी को छुडाकर लाना-श्रीशुकदेवजी वर्णन करते है एक दिन नन्दबाबा ने निराहार एकादशी व्रत किया द्वादशी को प्रात: पूर्व ही यमुना स्नान को चलेगए तो वरुण के दूत उन्हे पकड़ कर ले गए यह वात जब भगवान को मालूम हई वे वरुण लोक पहँच गए वहां वरुणजी ने भगवान की पूजा की और बोले मुझे आपके दर्शनों की अभिलाषा थी इस लिए मेरे दूत बाबा को लेकर यहां आ गए जिसके लिए आप क्षमा करें वरुण का भाव देख भगवान वरुण जी कृतार्थ कर बाबा को लेकर बृज मे आ गए।
इति अष्टाविंशतिऽध्यायः

[ अथ एकोनत्रिंशोऽध्यायः ]

रासलीला का प्रारम्भ---
भगवानपि तारात्री: शरदोत्फुल्ल मल्लिकाः
वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमाया मुपाश्रितः
ततोडुराजः ककुभ: करैमुखं
प्राच्या विलिम्पन्नरुणेन शन्तमै
स चर्षणीना मुदगाच्छुचो मृजन
प्रिय: प्रियाया इवदीर्घ दर्शन:
श्रीशुकदेवजी वर्णन करते है कि भगवान ने उस रात्रि में चारों ओर पुष्प खिला दिए वृन्दावन महक उठा अब उन्होंने रास का मन बनाया और अपनी प्रिय गोपियों को बुलाने के लिए बंशी बजाई। भगवान का वंशी वादन सुन कर बृज गोपी जल्दी में लहगा ओढ लिया ओढनी को पहन ली कान में नथ पहन ली नाक में झुमकी डालली उल्टे सीधे भंगार कर भगवान के पास पहुच गई। भगवान बोले गोपियों आपका स्वागत कहिए आपका क्या प्रिय करु कैसे आपका पधारना हआ। तम्हे अपने पतियों को छोड़कर पर पुरुष के पास नहीं आना चाहिए यह सन गोपियां हत प्रभ रह गई देखो भगवान ने एक-एक को वंशी में नाम लेकर बलाया और अब पूछ रहे हैं कैसे आई वे बोली संसार के विषय सुखों को छोड़ हम आपके चरणों की शरण आई है। उन्होंने कहा हमें अपने पतियों को छोड़ कर नही आना चहिए प्रभो हम आपको एक कहानी सुनाती हैं एक पतिव्रता स्त्री थी वह नित्य अपने पति की पूजा कर उसे भोजन कराकर फिर स्वयं भोजन करती थी एक दिन पति को कहीं बाहर जाना था वह अपने पति से बोली आप कुछ दिनों के लिए बाहर जा रहे हैं ऐसे में मैं आपकी पूजा किए बिना भोजन कैसे करूँगी पति ने कहा हम भगवान की पूजा मूर्ति में कर लेते हैं तुम भी मेरी एक मूर्ति बना लो उसकी पूजा कर भोजन कर लेना स्त्री ने ऐसा ही किया मिट्टी की पति की मूर्ति बना वह पूजा करने लगी एक दिन जब वह पूजा कर रही थी उसका पति आ गया और उसने दरवाजा खट खटाया अब वह पूजा छोड़ दरवाजा खोलने जाती है तो पति पूजा खण्डित होती हैं और नहीं जाती है तो पति आज्ञा भंग होती है। गोविन्द आप बताएं उसे क्या करना चहिए भगवान बोले जब उसका साक्षात् पति आ गया तो उसे पहले दरवाजा खोलना चहिए। गोपियां बोली ठीक है हम भी आप से यही सुनना चाहती थी हम जिन पतियों को छोड कर आई हैं वे सब मिट्टी के पति हैं आप साक्षात् पति हैं उनका संबंध जब तक शरीर है तब तक है लेकिन आत्मा परमात्मा का संबंध जन्म जन्मान्तर का है। भगवान बोले गोपियों मैं तो तुम्हारी परीक्षा ले रहा था। अब तुम्हारे साथ रास करूंगा सब गोपियां गोलाकार खड़ी हो गई बीच में राधागोविन्द नृत्य करने लगे अनेक हाव-भाव दिखाने लगे करते-करते गोपियों के मन में अहंकार आ गया हम कितनी भाग्यशाली हैं परमात्मा हमारे इशारे पर नाच रहा है इतने में भगवान अन्तर ध्यान हो गए गोपियां बिलख उठी रोने लगी।
इति एकोनत्रिशोऽध्यायः

[ अथ त्रिंशोऽध्यायः ]

श्रीकृष्ण के विरह मे गोपियों की दशा-लता वृक्षों से पूछती हुई ढूढ़ने लगी चरण चिह्नों से पता चला कि राधा महारानी उनके साथ है गोपियां कृष्ण लीला करने लगी एक गोपी पूतना बन गई दूसरी कृष्ण ने पूतना को मार दिया ऐसे लीला करने लगी उधर भगवान राधा महारानी के साथ विहार करते करते राधाजी मानवती हो गई कहने लगी प्रभो अब मुझसे नहीं चला जाता मुझे कंधे पर चढा लें। भगवान बोले ठीक है कहकर वहां से भी अन्तरध्यान हो गए वह सखी भी मूर्च्छित होकर गिर गई जब अन्य गोपियां भगवान को ढूंढती हुई वहां पहुंची तो वहां राधा महारानी भी बेसुध पड़ी है वे समझ गई कि इनके साथ भी वही हुआ है जो हमारे साथ हुआ है।
इति त्रिंशोऽध्यायः

[ अथ एकत्रिंशोऽध्यायः ]

गोपिका गीत----
दर्शन देवो रास बिहारी प्रभु ढूढ़ रही गोपी सारी
महिमा अधिक बनी बृज की बैकुण्ठ हु ते बनवारी
सुन्दरता मृदुता की देवी लक्ष्मी रमत विहारी-दर्शन
तजि बैकुण्ठ वास बृज कीनो लक्ष्मी दासी तिहारी
नाथ गोपियां ढूढ़ रही है चरणाश्रित प्रभु थारी-दर्शन
प्रेम पूर्ण हिरदा के स्वामी बिनामोल की दासीतिहारी
कमल नयन सों घायल करना क्या वध नही मुरारी-दर्शन
काली दह जल अरु दावानल बृषभासुर व्योमासुर भारी
इन्द्रकोप से रक्षाकीनी बृज की आप असुरारी-दर्शन
यशोदा नन्दन मात्र नही हो जनजन के हितकारी
ब्रह्माजी की विनती सुनकर बृज प्रकटे गिरधारी-दर्शन
शरणागत भवबन्धन मेटत पूरण काम विहारी
हस्त कमल सिर उपर रखदो लक्ष्मीपति वनवारी-दर्शन
बीरशिरोमणि बृज जनरक्षक प्रेमीजन मदहारी
रूठोमत दर्शन दो स्वामी सुन्दरश्याम बिहारी-दर्शन
उरकी ज्वाला शान्त करो प्रभु रख दो चरण मुरारी
कालीफण पर नृत्य कियो जिन नाशक पाप विहारी-दर्शन
मधुर वाणी से मोहित करते ऋषिमुनि तनुधारी
अधरामृत कापान करादो जीवन देवो खरारी। दर्शन
पापताप की मेटनहारी लीला कथा तुम्हारी
ऋषिमुनि जन गान करत हैं लीलामंगलकारी। दर्शन
दर्शन परसन का सुखदीना इकदिन हे गिरधारी।
सुनलो कपटी मित्र आजवे दुखी विरह की मारी। दर्शन
कोमलचरण विचरणबन करते दुखीकरत मनभारी
धूषरधूरिमुख दर्शनदेदो विनती यहीहमारी। दर्शन
तप्त ह्रदय को शान्तकरो उररखदो चरणमुरारी
शरणागत के पूर्णकाम प्रभु जन के कष्टनिवारी। दर्शन
अधरामृत का पान करादो विरह मिटावन हारी
जिनकोनित पीवतबांसुरिया आसक्तिमिटावनहारी। दर्शन
पतिसुतभ्रात कुटुम्ब तजे हम तेरे हित बनवारी
निषाकाल में छोड़ गए विरहवन्त दुखी बृजनारी। दर्शन
हंसीठिठोली करते मोहन प्रेमभरी मुस्कान तिहारी
श्रीनिवास वक्षस्थल उपर सब गोपीजन वारी। दर्शन
दुख संताप मिटाने वाली प्रभु अभिव्यक्ति तुम्हारी
ह्रदयरोग को दूर करो दे दो औषधि बनवारी। दर्शन
स्तन कठोर है चरण कमल सम कोमल कुंजविहारी
कंकडपत्थर कैसे सहेगें मन अधीर गिरधारी। दर्शन
गाती रोती और विलखती गोपी करत पुकारी
दास भागवत दर्शन दीने गोपी भई सुखारी। दर्शन
इति एकत्रिंशोऽध्याय

[ अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः ]

भगवान का प्रकट होकर गोपियों को सान्त्वना देना-
इति गोप्य: प्रगायन्त्यः प्रलपन्त्यश्च चित्रधा
ससदुः सुस्वरं राजन् कृष्ण दर्शन लालसा
तासामाविरभूच्छौरिः स्वयमान मुखाम्बुजः
पीताम्बरधरः स्रग्वी साक्षान्मन्मथ मन्मथ:
इस प्रकार गोपी भगवान के दर्शन की लालसा से उंचे स्वर से जोरजोर से रोने लगी तो साक्षात् कामदेव के समान भगवान प्रकट हो गए गोपियों के शरीर में प्राण आ गए सभी गोपियों को ह्रदय से लगा लिया भगवान बोले गोपियों अब महा रास होगा।
इति द्वात्रिंशोऽध्यायः

[ अथ त्रयत्रिंशोऽध्यायः ]

महारास निरतत रास मे गोपाल।
वंशीवट जमुना पुलिन पर शरद शशि उजियार
मोर मुकुट सु शीश सोहे तिलक राजे भाल
श्रवण कुण्डल वक्ष धारे वैजयन्ति च माल
मन्द मन्द सुख सुगन्धित पवन शीतल चाल
सरस सारंगी पखावज बाजत बीन रसाल
ताताथेइ ताताथेइ चरण धरत दयाल
देव सब छाये विमानन दरश हित नन्दलाल
गति विसारी इन्दु निरखत बजत मधुरे ताल
इति त्रयत्रिंशोऽध्यायः

[ अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ]

सुदर्शन और शंख चूड का उद्धार-श्रीशुकदेवजी वर्णन करते है एकबार सब बृजवासी नन्द बाबा के साथ अम्बिका वन में शिवजी के दर्शनों हेतु गए ओर वहीं रात्री निवास किया वहाँ एक अजगर रहता था उसने रात में नन्द बाबा को आकर पकड़ लिया बाबा के चिल्लाने पर सब जग गए भगवान भी आ गए उस अजगर को अपना चरण छुआकर उद्धार कर दिया वह एक विद्याधर था शाप वश सर्प बना था। भगवान को प्रणाम कर अपने लोक को चला गया। एक दिन कृष्ण बलराम वन में गाये चरा रहे थे कि एक शंख चूड नाम का दैत्य गोपियों को हरण कर ले गया गोपियों के रोने की आवाज सुन भगवान ने उस दैत्य के मस्तक की मणि निकाल ली ओर उसे मार दिया और गोपियों को छुडा लिया।
इति चतुस्त्रिंशोऽध्यायः

[ अथ पंचत्रिंशोऽध्यायः ]

युगल गीत-----
जोरस बरसरह्यो बृजमाहि सोरस तिहलोकन मे नाही
सकरीगली बनीपरवतकी दधि लेचली कुवरि कीरतकी
आगे गाय चरत गिरधर की देगें सखा सिखाय। जोरस
देजादान कुवरि मोहन को तब छोडूं तेरे गोहन को
राज महाबनमे गिरधर को दान लेयगें धाय। जोरस
इनके संग सखी मदमाती उनके संग सखा उत्पाती
घेरलइ ग्वालिन मदमाती मनमे अति हर्षाय। जोरस
सुरतेतीसनकी मतिभोरी भजके चले सब बृजकी ओरी
देख देख या बृज की खोरी ब्रह्मादिक ललचाय। जोरस
इति पंचत्रिंशोऽध्यायः

[ अथ षट् त्रिंशोऽध्यायः ]

अरिष्टासुर का उद्धार और कंस का अक्रूरजी को बृज भेजना-श्रीशुकदेवजी वर्णन करते है एक दिन अरिष्टासुर नाम का राक्षस बैल का रूप धारण कर अपने सीगों से बृज वासियों को मारता हुआ उपद्रव मचाने लगा खुरों से भूमि को खोदता हुआ लोगों को डराने लगा भगवान ने उसके दोनो सीगं पकड कर घुमाकर पछाड दिया। एक दिन नारदजी कंस के पास आ गए और समाचार पूछे कंस ने बताया कि प्रभो जितने भी राक्षसों को बृज में भेजा एक भी वापस नहीं आया नारदजी बोले यही तो गलती हुई अपनी गली में कुत्ता भी शेर होता है। उन्हे यहाँ बुलावो और अपना कार्य सिद्ध करो कह कर नारदजी चले गए कंस ने कृष्ण बलराम को मथुरा लाने के लिए अक्रूरजी को बृज में भेजने का निश्चय किया।

इति षट्त्रिंशोऽध्यायः

[ अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः ]

केशी और व्योमासुर का उद्धार-नारदजी द्वारा भगवान की स्तुति-श्रीशुकदेवजी वर्णन करते है परीक्षित्! कंस का भेजा हुआ केशी नाम का दैत्य घोड़े का रूप बनाकर आया वह दुलत्ती फेंकता हुआ लोगों को काटता हआ उपद्रव मचाने लगा वह भगवान की और मुँह फैलाकर दौड़ा भगवान ने अपना हाथ उसके मुँह में दे दिया और मुँह में ही उसे इतना फैलाया कि उसका स्वांस रुक गया और वह समाप्त हो गया। एक दिन एक व्योमा सुर नाम का राक्षस भी ग्वाल बनकर भगवान के साथ ग्वाल मण्डली में जाकर मिल गया और सब भेड़ चोर खेल खेलने लगे इस खेल में कुछ ग्वाल भेड़ बन गए कुछ रक्षक कुछ चोर बन गए चोर भेडों को उठाकर ले जाते और दूर बैठा आते वह राक्षस भेड़ बने ग्वालों को उठाकर एक गुफा में बन्द कर आता ऐसे कई ग्वालों को ले गया अन्त में बलरामजी को जब उठाकर ले जा रहा था वे समझ गए और एक मुष्टिका में उसके प्राणान्त कर दिए।नारदजी कंस को समझाकर कि कृष्ण बलराम को मथुरा बुलावो वे सीधे भगवान के पास पहुचे और कहा प्रभो अब समय आ गया है मथुरा पधार कर मुष्टिक चाणूर ओर कंस को समाप्त करें।
इति सप्तत्रिंशोऽध्यायः
श्रीमद् भागवत महापुराण की संपूर्ण सप्ताहिक कथा क्रमशः 335 अध्यायों में।
Complete Weekly Story of Srimad Bhagwat Maha Purana in 335 chapters respectively.

श्री भागवत महापुराण की हिंदी सप्ताहिक कथा जोकि 335 अध्याय ओं का स्वरूप है अब पूर्ण रूप से तैयार हो चुका है और वह क्रमशः भागो के द्वारा आप पढ़ सकते हैं कुल 27 भागों में है सभी भागों का लिंक नीचे दिया गया है आप उस पर क्लिक करके क्रमशः संपूर्ण कथा को पढ़कर आनंद ले सकते हैं |

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