( भगवत्प्राप्ति कब होती है )
जबतक कामवृत्ति जीव में रहती है, तब तक भगवान नहीं मिलते!
हाँ कामवृत्ति का नाश होने पर, स्वार्थ रहित होने पर कामना रहित होने पर, परहित सेवा करने पर और श्री हरि- गुरुदेव जी की आज्ञा मे रहने पर भगवान के दर्शन व मिलन अवश्य होगा! ऐसे साधक भक्त को भगवान की स्मृति बनी रहेगी जिस भक्त को भगवान याद करते हैं उस भक्त की कामवासना नष्ट हो जाती है उस साधक भक्त को वसुदेवः सर्व का अनुभव बना रहता है असत् शरीर को अपना मान लेने से काम क्रोधादि सभी दोष अंतःकरण में जागृत हो जाते हैं इन दोषों के कारण ही प्राणी भगवान को भूल जाता है अपने दोष भगवान के सम्मुख रखने से यह दोष समाप्त हो जाते हैं हमें भगवान के सम्मुख होना है बस यही तो हमें करना है ऐसा होने पर भगवान स्वयं अपने भक्तों को अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं
चित्तवृत्ति भगवान में लगी रहने से भगवान की प्राप्ति अवश्य होती है
इसके लिए सद्गुरुजनों की सत्संगति करते रहना चाहिए सत्संग से भगवत्दर्शन से जीवन सुधरता है काम-क्रोधादि विकार नष्ट होते हैं और मन भगवान का मंदिर बन जाता है फिर साधक भक्त भगवान को नहीं भूलता भगवान की भक्ति में उसकी आत्मा का समावेश हो जाता है यही आध्यात्मिक जीवन में भक्ति का विधान है उसकी अनुभूति होने पर साधक भक्त भगवान के प्रति आसक्त हो जाता है और फिर भगवान की शरण ग्रहण कर लेता है भक्त भगवान से श्रद्धा विश्वास पूर्वक प्रेम से तथा करुणा भाव से प्रार्थना करता है कि हे नाथ है मुझे शुभ कर्मों से युक्त करें मैं अपने कर्मों के बल पर आपको नहीं पा सकता आप स्वयं ही दया करके मुझे अपना लीजिए भक्त की करुण पुकार सुनकर जब भगवान उस पर कृपा करते हैं तो भक्त पूर्ण हो जाता है उसके बंधन विकार स्वयं ही दूर हो जाते हैं भक्त के हृदय में,,
भगवान के प्रति शुद्ध भाव तथा निष्काम प्रेम जागृत होने पर
उसका कल्याण ही कल्याण होता है ,चित्तवृत्ति को भगवान में ही लगाना भगवत प्राप्ति का यही साधन है ऐसा होने पर अंत में प्रियतम नाम और नामी (ईश्वर) की मधुर स्मृति तथा लीला दर्शन अपने आप होने लगते हैं भगवत्स्मृति सदा बनी रहने के लिए फिर किसी प्रकार का परिश्रम नहीं करना पड़ता सदगुरुदेव के मार्गदर्शन पर चलने से ही ऐसी उत्तम स्थिति बनती है
जो साधक भक्त श्रद्धा-विश्वासपुर्वक निष्काम भाव से और विशुद्ध प्रेम के साथ है भगवान के ऊपर निर्भर हो जाता है वह निस्संदेह भगवत प्राप्ति का लाभ उठा लेता है नाम-जाप,नाम- स्मरण तथा भगवत्स्वरूप के चिंतन से साधक भक्त का अंतःकरण शुद्ध हो जाता है और भगवान के प्रति उसका प्रेम भाव उमड़ता है उसमें किसी प्रकार का अभिमान नहीं रहता गुणों का अभिमान ना रहने के कारण उस पर..
श्रीहरि सद्गुरु देव की कृपा बनी रहती है
यह कृपा ही व्यक्ति को संसार-बंधन से बचाती है इस कृपा से ही मनुष्य के दोषों का नाश होता है जिससे शीघ्र ही उसे भगवत्प्रेम की प्राप्ति होती है भगवत्प्रेम प्राप्त होने पर उसे ईश्वर साक्षात्कार हो जाता है मैं कुछ भी संदेह नहीं है ईश्वर का साक्षात्कार हो जाता है इसमे कुछ भी सन्देह नहीं है ईश्वर का साक्षात्कार हो जाने पर पाप जल जाते हैं राग द्वेष मिट जाते हैं और उसमें अहंकार नहीं रहता साधक भक्त को चाहिए कि वह किसी भी परिस्थिति में अधीर और निराश ना हो हर हाल में भगवान पर निर्भर रहें यह दृढ़ विश्वास रखें कि प्रभु उसके योग क्षेम का पालन स्वयं करेंगे...
प्रभु प्रेम और उनसे मिलने की लालसा को हर समय जागृत रखें
सर्वथा अपने को असमर्थ समझकर प्रभु की शरण में ही रहे भगवान्नाम के द्वारा मनुष्य अपनी आध्यात्मिक और दैवी प्रकृति को विकसित करके सारी निराशा और विषय कामना से ऊपर उठ सकता है भगवान्नाम स्वयं जीवो का उद्धार करने वाला है भक्ति और श्रद्धा के साथ जब भगवान्नाम का उच्चारण किया जाता है तो भगवान स्वयं भक्त के साथ तादात्म्य (उसी के रूप का हो जाना) भाव में आ जाते हैं.,
आध्यात्मिक प्रबुद्धता के परिणाम स्वरुप है
मानव यह समझ लेता है कि संपूर्ण जगत में केवल एक परमात्मा की ही सत्ता है अर्थात पूर्ण रूप से एक ही परमात्म तत्व सर्वत्र विद्यमान है उनका हर पूर्ण रूप से कभी भी वर्णन नहीं कर सकते परमात्मा ही अखंड सत्यस्वरूप अनंत ज्ञान स्वरूप तथा पूर्णपरमानंद स्वरूप है हम उनकी शरण ग्रहण करते हैं शरणागत होने पर ही हम परमात्मा की कृपा का अनुभव कर सकते हैं और उनके स्वरूप के दर्शन पर कृतार्थ हो सकते हैं यही है भगवद् अमृत भगवान तत्वदर्शियो के परमतत्व है सच्चिदानंद है वे ही ब्रह्मवेताओ के ब्रम्ह है वे ही..
योगियों के परमात्मा है और वे ही भक्तों की भगवान है