[ विरक्त संत ]
महर्षि याज्ञवल्क्य
परम योगीश्वर ज्ञानियों के शिरोमणि महाराज जनक के भी गुरुदेव महर्षि याज्ञवल्क्य प्रारंभ में गृहस्थ ही थे | जब वे गृहस्थ थे महाराज जनक की सभा में जो गायें सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी के लिए थी , उन्हें अपने शिष्य को उन्होंने हाँक देने को कहा | शास्त्रार्थ में वह विजई हुये, सभी ऋषियों ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ माना,
किंतु ध्यान देने योग्य तो उनकी नम्रता है | उनसे गौएँ ले जाते समय लोगों ने पूछा- याज्ञवल्क्य ! तुम अपने को सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी मानते हो ? उन्होंने सरलता से उत्तर दिया ज्ञानियों को तो मैं नमस्कार करता हूं ! मुझे तो गायों की आवश्यकता है, इसलिए ले जा रहा हूं | वही महर्षि समय आने पर विरक्त हो गए | सन्यास आश्रम स्वीकार किया उन्होंने , एक कोपीन और जल पात्र के अतिरिक्त उनके पास कुछ नहीं था |
भगवान ऋषभदेव
संपूर्ण प्रथवी के चक्रवर्ती सम्राट थे भगवान ऋषभदेव, लेकिन वे तो पृथ्वी पर आए ही थे अवधूत वेश का परम आदर्श विश्व को दिखाने |उन्होने उपदेश किया था- वह गुरु गुरु नहीं, वे स्वजन स्वजन नहीं, वह पिता पिता नहीं, वह माता माता नहीं, वह भाग्य भाग्य नहीं और वह स्वामी स्वामी नहीं जो आती मौत से बचा ना सके, संसार मृत्यु ग्रस्त है | इसमें सर्वत्र मृत्यु की ही दूर्दमनीय क्षाया है | यह प्रत्यक्ष दिखलाने के लिए चक्रवर्ती सिंहासन का उन्होंने त्याग कर दिया | त्याग की पराकाष्ठा भोजन और जल तक का त्याग , मुख में एक पत्थर का टुकड़ा रख लिया और उन्होंने मौन होकर उन्मत्त के समान वनों में विचरते रहे | वन में दावाग्नि लगी-- उनकी वह पवित्र देह आहूति बन गई, किंतु जो शरीर नहीं, जिसकी शरीर में तनिक भी आसक्ती नहीं उसे अग्नि का क्या भय, अग्नि हो या काल हो वह उनकी वंदना ही तो कर सकता था |
श्री शुकदेव जी
महाराज परीक्षित जब राज्य त्यागकर के मृत्यु की प्रतीक्षा में निर्जल व्रत लेकर भगवती भागीरथी के किनारे बैठे, सभी ऋषि मुनि उन परम भागवत के समीप आए उनमें भगवान परशुराम और भगवान व्यास थे, समस्त देवता-असुरों के पिता महर्षि कश्यप थे , परम तेजस्वी महर्षि भृगु थे, किंतु षोडशवर्षीय नवजलधर सुंदर दिगंबर अवधूत व्यास नन्दन श्री शुकदेव जी के आने पर सब उठ खड़े हुए | सबसे उच्चासन पर महाराज ने उन्हें बैठाकर उनकी पूजा की, यह ज्ञान वैराग्य त्याग और भक्ति का अपार प्रभाव और ऐसे ऋषियों के भी उन परम वंदनीय ने सुनाया क्या- श्रीमद् भागवत ! श्री कृष्ण चंद्र के चरणों में अनुराग ही समस्त साधनों का परम फल है , यही उनका अमृतोपदेश है |
श्री शंकराचार्य
वैदिक धर्म की स्थापना की किसने ! किसने कन्याकुमारी से हिमालय तक सनातन धर्म का विजय घोष कराया ? जगतगुरु शंकराचार्य के अतिरिक्त इसमें भला दूसरा कौन समर्थ था | वह विरक्त शिरोमणि उन्होंने तो स्पष्ट घोषित किया समस्त दृश्य प्रपंच मिथ्या है , अज्ञानी ही मोह वश इसे सत्य मानकर इनमें आसक्त रहता है | सत्य तो केवल एक चेतन सत्ता है , निर्विकार नित्य निर्गुण आनंद स्वरूप ब्रह्म सत्ता, उसकी अनुभूति ही ज्ञान है और उस ज्ञान से ही जीव अपने जीवन से मुक्त होता है |