एक दिन अर्जुन इंद्र के साथ उनके सिंहासन पर बैठे थे देवराज ने देखा कि पार्थ की दृष्टि देव सभा में नाचती हुई उर्वशी अप्सरा पर लगी है | इंद्र ने समझा कि अर्जुन उस उर्वशी अप्सरा पर आसक्त हैं , पराक्रमी धनंजय को प्रसन्न करने के लिए उन्होंने एकांत में चित्रसेन गंधर्व के द्वारा उर्वशी को रात्रि में अर्जुन के पास जाने का संदेश दिया |उर्वशी अर्जुन के भव्य रूप एवं पराक्रम पर पहले से ही मोहित थी, इंद्र का संदेश पाकर बहुत प्रसन्न हुई | उसी दिन चांदनी रात में वस्त्रा भरण से अपने को भलीभांति सजाकर अर्जुन के पास पहुंची,
अर्जुन ने उसका आदर से स्वागत किया |
जो उर्वशी बड़े-बड़े तपस्वी ऋषियों को खूब सरलता से विचलित करने में समर्थ हुई थी |भगवान नारायण की दी हुई जो स्वर्ग की सर्वश्रेष्ठ सुंदरी थी | एकांत में वह रात्रि के समय अर्जुन के पास गई थी , उसने इंद्र का संदेश कहकर अपनी वासना प्रकट की | अर्जुन के मन में इससे तनिक भी विकार नहीं आया, उन्होंने कहा माता आप हमारे पुरु वंश के पूर्वज महाराज पुरुरवा की पत्नी रही हैं,आपसे हमारा वंश चला है | भरतकुव की जननी समझकर ही देव सभा में मैं आपको देख रहा था और मैंने मन ही मन आपको प्रणाम किया था | देवराज को समझने में भूल हुई, मैं तो आपके पुत्र के समान हूं, मुझे क्षमा करें |
उर्वशी काममोहिता थी उसने बहुत समझाया कि स्वर्ग की अप्सराएं किसी की पत्नी नहीं होती ,
उनका उपभोग करने का सभी स्वर्ग आए लोगों को अधिकार है | परंतु अर्जुन का मन अविचल था उन्होंने कहा देवी मैं जो कहता हूं, उसे आप सब दिशाएं और सब देवता सुनलें | जैसे मेरे लिए माता कुंती और माद्री पूज्य हैं, जैसे सची मेरी माता हैं, वैसे ही मेरे वंश की जननी आप मेरी माता हैं ! मैं आपके चरणों में प्रणाम करता हूं | रुष्ट होकर उर्वशी ने एक वर्ष तक नपुंसक रहने का शाप दे दिया | अर्जुन के इस त्याग का कुछ ठिकाना है ! सभाओं में दूसरों के सामने बड़ी ऊंची बातें करना तो सभी जानते हैं,
किंतु एकांत में युवती स्त्री प्रार्थना करें और उसे माता कहकर वहां से अछूता निकल जाए ,
ऐसे तो विरले ही होते हैं | अर्जुन का यह इंद्रिय संयम तो इससे भी महान है | उन्होंने उस उर्वशी को एकांत में रोती , गिडगिडाती लौटा दिया, जिसके कटाक्ष मात्र से बड़े-बड़े तपस्वी क्षणभर में विचलित हो जाते थे |