कहानी हिन्दी शांति की विष्णु भक्ति kahani Hindi कहानी सुनाओ

कहानी हिन्दी-शांति की विष्णु भक्ति !

शांति की विष्णु भक्ति➡ ( बचपन में दादी अम्मा से सुनी कहानी ) 

एक गांव में एक ब्राह्मण रहते थे, वह बड़े ही धार्मिक तथा भगवत भक्त थे | उनका नित्य का नियम था प्रभु की पूजा अर्चना करना और वे कृषि कार्य करते थे, उनका जीवन कृषि पर ही निर्भर था | उन ब्राम्हण का विवाह हुआ और समय आने पर उनको कन्या रत्न की प्राप्ति हुई |

ब्राम्हण बहुत प्रसन्न हुए की बिटिया का जन्म हुआ और उन्होंने उस बिटिया का नाम शांती रखा | समय बीता शांति चार साल की हो गई और नित्य अपने पिता को भगवान की पूजा करते देखती तो प्रसन्न हो जाती, उसने एक दिन अपने पिता से पूछा पिताजी आप यह क्या कर रहे हैं |

तब उन ब्राम्हण ने शांती को बड़े प्रेम से बताया-- बेटी शांती यह भगवान नारायण हैं, इनकी ही मैं पूजा करता हूं | शांती ने पुनः प्रश्न किया पिताजी यह नारायण कौन हैं,तथा पूजा क्यों की जाती है | यह बात सुनकर ब्राह्मण देवता थोड़ा मुस्कुराए की बिटिया कितनी छोटी है और प्रश्न बड़े-बड़े कर रही है | उन्होंने शांति को बताया बेटी

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इस संपूर्ण ब्रह्मांड का संचालन भगवान नारायण के ही द्वारा होता है | और उनकी पूजा करने से वे प्रसन्न हो जाते हैं और अपने भक्तों को वरदान देते हैं | अपने पिता के वचनों से शांती बड़ी प्रभावित हुई और जैसे कि छोटे-छोटे बच्चे सभी खेल खेलते हैं, शांती भी खेलती थी लेकिन भगवान नारायण के बारे में जब उसने अपने पिता जी के मुख से सुना तो भगवान नारायण को प्राप्त करने की इच्छा उसके हृदय में जागृत हो गई |

खेलकूद को छोड़ शांति मिट्टी से ही खिलौने की जगह भगवान नारायण की मूर्ति बनाई जैसी भी बने उससे, और वह उन्हें भगवान नारायण मानकर उनकी पूजा करने लगी | छोटी सी बच्ची शांती निर्मल मन और भगवान में पूर्ण श्रद्धा और विश्वास जिसके कारण कुछ ही दिनों में भगवान नारायण उसकी निर्मल भक्ति से प्रसन्न होकर शांति के सामने प्रकट हो गए , और शांति से कहने लगे बेटी मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूँ , वरदान मांगो !

शांति छोटी बच्ची थी खिलौने , मिठाई , कपड़े आदि कुछ भी मांग लेती जो छोटे-छोटे बच्चों की मांग होती है, परंतु शांती भगवान नारायण की मोहिनी सूरत को देखा तो बड़ी प्रसन्न हो गई, भगवान नारायण का इतना सुंदर रूप की शांति ने भगवान को प्रणाम करते हुए कहने लगी-- भगवन अगर आप मेरी पूजा से प्रसन्न होकर मुझे वरदान देना चाहते हैं, तो मैं आपसे यही वरदान मांगती हूं कि आप मुझे इस अनुपम छवि का प्रतिदिन दर्शन कराएं |

भगवान नारायण शांति का अद्वितीय वरदान सुनकर आश्चर्य में पड़ गए कि इस छोटी सी बच्ची ने मुझे बंधन में डाल दिया, फिर भी शांति से भगवान नारायण ने कहा कि बेटी शांती यह तुम्हारा वरदान मुझे बंधन में डालने वाला है | फिर भी मैं तुम्हें यह वरदान प्रदान करता हूं |

लेकिन तुम्हें भी मेरी एक शर्त माननी होगी ? शांति ने कहा बताएं प्रभु मैं अवश्य मानूंगी, भगवान नारायण ने कहा कि मैं प्रतिदिन एक साधु का वेश धारण करके आऊंगा जहां भी रहेगी तू और भिक्षां देहि ! आवाज लगाऊगा तुम मुझे कुछ अन्न प्रदान करना और मैं तुम्हें अपने स्वरूप का दर्शन देकर अंतर्धान हो जाऊंगा |

लेकिन बेटी शांती जिस दिन तुमने मुझे भिक्षा में अन्न नहीं प्रदान किया , उसी दिन मैं अपने इस बंधन से मुक्त हो जाऊंगा , फिर मैं तुम्हें दर्शन नहीं दे पाऊंगा | शांती ने यह बात स्वीकार कर ली , भगवान नारायण वरदान देकर अंतर्धान हो गए |

उस दिन से भगवान नारायण नित्य साधु के वेश में आते शांती के घर भिक्षा लेते शांति को दर्शन देते और चले जाते |
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दिन बीतते गए जैसे चंद्रमा की कलाएं बढ़ती हैं, वैसे ही शांती बढ़ने लगी और जवान हो गई|

साधु के रोज आने के कारण गांव के लोग तरह-तरह की बातें करने लगे और जब शांति के पिता ब्राम्हण देवता को यह बात पता चली कि गांव में मेरी बेटी को लेकर तरह तरह की बातें हो रही हैं, तो वे बड़े दुखी हुये और अपनी कन्या का विवाह का विचार लेकर एक नगर में गए वहां उन्हें उत्तम वर मिल गया |

ब्राह्मण बालक के साथ अपनी शांति का विवाह तय कर दिया | शांति का विवाह हो रहा था शांती वहीं विवाह मंडप पर बैठी हुई थी | यहां भगवान नारायण ने विचार किया शांती इस समय विवाह की विधि कर रही है, जिसे छोड़कर यह घर के अंदर नहीं जा सकती तो आज मैं अपने बंधन से मुक्त हो जाऊंगा |

भगवान नारायण पहुंच गए अवाज लगायी - भिक्षां देहि ! और मुस्कुरा कर कहने लगे शांती मुझे भिक्षा दो, शांती को देर नहीं लगी तुरंत शादी में जो गांठ बांधी जाती है पति और पत्नी के बीच उसमें पंडित कुछ चावल और दक्षिणा के साथ गांठ बांधते हैं |वह तुरंत गांठ खोली और चावल के कुछ दाने भगवान नारायण को दे दी | भगवान नारायण प्रसन्न हो गए कहने लगे वाह शांति | लगता है तू मुझे इस बंधन से मुक्त करने वाली नहीं है , दर्शन देकर अंतर्ध्यान हो गए |

कहानी हिन्दी-शांति की विष्णु भक्ति !विवाह होकर शांति अपने ससुराल को चली गई और जब वहां भी साधु के रूप में भगवान नारायण पहुंचने लगे, तो वहां के लोग भी तरह-तरह की बातें करने लगे कि देखो जिस दिन से यह नई नई बहू आई है फलाने की ? उसी दिन से यह साधु भी नित्य प्रति आता है |

शांती के ससुर ने जब गांव के लोगों की ऐसी बात को सुना तो शांती से मना किया कि तुम उस साधु को मना कर दो कि, हमारे घर ना आए !  भगवान नारायण ने शांति को बताया था कि यह बात किसी को भी मत बताना शिवाय अपने पति के क्योंकि तुम अर्धांगिनी हो पति के आधा अंग हो इसलिए तुम उससे कुछ छुपाना मत, पति जानता था |

इसलिए उसने भी शांती के तरफ से अपने पिताजी से बोला कि पिताजी आने दीजिए साधु महात्मा हैं, अगर उन्हें हम मना करेंगे तो हमें अपराध लगेगा | अगर गांव के लोग बातें करते हैं तो उन्हें करने दीजिए उनका तो काम ही है | यह  बात सुनकर शांति के ससुर को बहुत क्रोध आया कि यह बहू आते ही मेरे बेटे को अपने बस में कर लिया , क्रोधित होकर अपने बेटे और बहू दोनों को घर से निकाल देता है |

दोनों पति-पत्नी घर से निकल कर चलते चलते दूसरे राज्य में पहुंचे वहां का राजा जो था उसके एक ही पुत्र था और उसको बहुत भयानक कोढ़ रोग था बहुत से हकीम बैद आए, फिर भी उसे ठीक नहीं कर पाए | शांती के पति ने राजा से मुलाकात की कि मैं आपके बेटे को ठीक कर दूंगा, राजा अपने बेटे के पास ले गया और शांती के पति ने भगवान के चरणामृत का जैसे ही सिंचन किया उसके ऊपर |

उस बालक का रोग जड़ से समाप्त हो गया और वह प्रसन्न होकर चलने फिरने लगा | राजा यह देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और प्रसन्न होकर अपना आधा राज्य उसे दे दिया | शांति और उसके पति प्रेम से उस राज्य में रहने लगे और शांति के पति और राजा के लड़के की आपस में बढ़िया गहरी मित्रता हो गई |

दोनों साथ ही जंगलों में शिकार खेलने जाते | नित्य प्रति की भांति साधु महात्मा उस राज्य में भी पहुंचने लगे, वहां के लोग तथा मंत्रियों ने यह बात राजा से बताई कि महाराज जिस दिन से वह ब्राह्मण और ब्राह्मणी हमारे राज्य में आए हैं, उस दिन से एक साधु महात्मा नित्य प्रति यहां आता है भिक्षा लेने |

राजा आया और शांती से पूछा कि वह महात्मा यहां नित्य प्रति क्यों आता है, शांती ने जवाब दिया कि राजन आपने हमें अपना आधा राज्य प्रदान किया है ? अब आपको मतलब नहीं रखना चाहिए कि हमारे यहां कौन आता है और कौन जाता है ! आप अपना राज्य संभाले और आता है तो साधु ही है वह ? यह बात राजा ने सुना क्रोधित हो गया, छत्रिय खून खौल उठा तलवार निकाला राजा ने और शांती का गला धड़ से अलग कर दिया |

कुछ ही देर में शांती का पति आया देखा कि मेरी पत्नी अब नहीं रही उसने विचार किया कि जब यह नहीं तो अब मैं क्या करूंगा जीवित रहकर प्रेम के कारण उसने भी अपनी कटारी से अपना गला काटकर प्राण त्याग दिए |

कहानी हिन्दी-शांति की विष्णु भक्ति !उसके बाद जब उसका हितेषी  उसका परम मित्र राजा का लड़का आया उसने देखा कि मेरा मित्र नहीं रहा उसने भी तलवार से अपना गला काट लिया और मृत्यु को प्राप्त हो गया | राजा के लड़के की शादी हो चुकी थी उसकी पत्नी ने भी देखा मेरे पति नहीं रहे उसने भी तलवार से अपना प्राणांत कर लिया | 

चारों मृत शरीरों को राजा के आदेश के अनुसार शमशान घाट ले जाया गया, वहां पर सबसे नीचे शांति के मृत शरीर को रखा गया , उसके ऊपर शांति के पति के मृत शरीर को रखा गया तथा उसके ऊपर राजा के लड़के यानी शांति के पति के दोस्त को , उसके ऊपर राजा के बेटे की पत्नी को इस प्रकार चारों को एक ही चिता पर रखा गया | भगवान नारायण ने विचार किया कि यह शमशान घाट है, अभी यहां तो अन्न का सवाल ही नहीं पैदा होता और भगवान नारायण वहां साधु के वेश में आए और भिक्षां देहि ! आवाज लगाया | शांती पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गई और झटपट खड़ी हो गई  भगवान नारायण की कृपा से |

भगवान नारायण मुस्कुराने लगे कहने लगे बेटी शांती आज तो मैं बंधन से मुक्त हो जाऊंगा ?  शांति की आंखों में आंसू आ गए प्रेम के कारण | कहने लगी कि हां भगवन आज आप सत्य कह रहे हैं कि आप बंधन से मुक्त हो जाएंगे , क्योंकि यहां पर मेरे पास आपको देने के लिए कुछ भी अन्न नहीं है |

लेकिन आपसे निवेदन है कि मैं आपके चरण धुलना चाहती हूं ,आप अपने चरण कमलों को आगे बढ़ाइए | भगवान मुस्कुराने लगे कहने लगे शांती ना तेरे पास पात्र है ना जल है तू  कैसे चरण धुलेगी ? शांति ने कहा प्रभु आप चरण तो आगें बढ़ाएं | भगवान नारायण ने अपने चरणों को आगें बढाया , शांति भगवान केे चरणों को अपने हथेली में रख अपनेे आंसुओं से भगवान के चरण धुलने लगी |

उसके बाद भगवान का चरणामृत उन तीनों मृत शरीर के ऊपर छिडका जिससे तीनों जीवित हो गए | राजा ने जब यह दृश्य देखा उसकेेे अंधकार का नास हो गया वर राज्य का त्याग करके वन को चला गया | यहां चारों ने राज्य में आकर पुनः राज्य को सम्हाला और अन्त मे भगवान के धाम चले गये |

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