भारत भूमि की महिमा,भारत देश के बारे में जानकारी हिंदू धर्म बुद्ध धर्म से भिन्न नहीं है

✳ भारत प्रेम ✳
भारत भूमि की महिमा,हिंदू धर्म बुद्ध धर्म से भिन्न नहीं है
( अभिचार की बातें हिंदुस्तान में नहीं होतीं )
आप हिंदुस्तान की सतियों का इतिहास पढ़ हिंदू धर्म को भयानक समझते होंगे, परंतु सातियों के पवित्र हृदय तक अभी आपकी दृष्टि नहीं पहुंची है | सती होना पति प्रेम का अतिरेक है | उसमें विकृति आने का दोष धर्म पर क्यों लादा जा सकता है , यूरोप के इतिहास में देखिए, कुछ शताब्दियों के पहले धर्म की आड़ लेकर अंग्रेजो ने असंख्य स्त्री पुरुषों को जीते जी जला दिया था | कई ईसाइयों ने असंख्य स्त्रियों को डायन कहकर अग्नि नारायण के अधीन कर दिया था | ऐसी अभिचार की बातें हिंदुस्तान में नहीं होतीं | संभव है कि हिंदू धर्म वालों के विचार अभी तक सफल न हुए हों उनसे भूलें हुई हों, पर सर्वजीव हितकारी यदि कोई धर्म है , तो मैं जोर देकर कहता हूं कि वह हिंदू धर्म ही है | हिंदुस्तान की स्त्रियां पति के मृत देह के साथ अपने शरीर की आहुति दे सकती हैं, पर कोई हिंदू कभी किसी का अपकार करने की मन में भी नहीं लाता |

( हिंदू धर्म बुद्ध धर्म से भिन्न नहीं है )
एक ग्रीक प्रवासी ने बुद्धदेव के समय के भारत की दशा का वर्णन किया है , उसमें स्पष्ट लिखा है कोई भी स्त्री पर पुरुष संसर्ग नहीं करती और कोई पुरुष असत्य नहीं बोलता | इस वर्णन से हिंदुओं के उच्च चरित्र का परिचय आपको होगा | कोई बुद्ध धर्म को हिंदू धर्म से पृथक समझते हैं पर उनकी यह भूल है , हिंदू धर्म बुद्ध धर्म से भिन्न नहीं है | किंतु दोनों के सहयोग से संसार का बहुत कुछ कार्य हुआ है , जिस प्रकार यहूदी धर्म से ईसाई धर्म की उत्पत्ति हुई , उसी प्रकार हिंदू धर्म का उज्जवल स्वरूप स्पष्ट करने के लिए बुद्ध धर्म का आविर्भाव हुआ | यहूदियों ने इस ईशा के साथ छल किया उसे फांसी पर लटकाया, परंतु हिंदू धर्म वालों ने बुद्ध को अवतार माना और उसकी पूजा ही की | बुद्धदेव का अवतार हिंदू धर्म को मिटाने के लिए नहीं किंतु उसके तत्व और विचार हृदय स्वरूप में लाने के लिए समता- एकता और गुप्त तत्वज्ञान को प्रकाश करने के लिए हुआ था ! वर्ण या जाति का विचार न कर सारी मनुष्य जाति का कल्याण करना उनका उद्येश्य था | गरीब , अमीर, स्त्री, शूद्र सभी को ज्ञानी बनाने के उच्च उद्देश्य से प्रेरित हो कई ब्राह्मण शिष्यों के आग्रह करने पर भी उन्होंने अपने सब ग्रंथ संस्कृत भाषा में ना रचकर कर उसी भाषा में रचे जो उस समय बोली जाती थी  |
भारत रूपी सच्ची दुर्गा में जीवन और प्राण प्रतिष्ठा करें
( भारत रूपी सच्ची दुर्गा में जीवन और प्राण प्रतिष्ठा करें )
एक देश प्रेमी के वचन- मुझे तो अब उस देवता की उपासना करने दे जिसकी समस्त पूंजी- एक बूढ़ा बैल , एक टूटी हुई चारपाई, एक पुराना चिमटा, थोड़ी सी राख, नाग और एक खाली खोपड़ी है | क्या यह महिम्न स्तोत्र के महादेव हैं ? नहीं नहीं यह तो साक्षात् नारायण स्वरूप भूखे भारतवासी हैं | यही मेरा धर्म है और भारत के प्रत्येक मनुष्य का यही धर्म है, यही साधारण मार्ग , यही व्यावहारिक वेदांत और यही भगवान की भक्ति होनी चाहिए | केवल कोरी शाबाशी देने या थोड़ी सी सहिष्णुता दिखाने से काम नहीं चलेगा | भारत माता के प्रत्येक पुत्र से में एैसा क्रियात्मक सहयोग चाहता हूं जिससे वह चारों ओर दिन प्रतिदिन बढ़ने वाले राष्ट्रीय जीवन का संचार कर सके | संसार में कोई भी बच्चा शिशुपन के बिना युवावस्था को प्राप्त नहीं हो सकता | इसी तरह कोई भी मनुष्य उस समय तक विराट भगवान से अभेद होने का आनंद का अनुभव नहीं कर सकता जब तक कि समस्त राष्ट्र के साथ अभेदभाव उसकी नस नस में पूरा जोश ना मारने लगे | भारत माता के प्रत्येक पुत्र को समस्त देश की सेवा के लिए इस दृष्टि से तैयार करना चाहिए कि समस्त भारत मेरा ही शरीर है , भारतवर्ष का प्रत्येक नगर नदी वृक्ष पहाड़ और प्राणी देवता माना जाता है और इसी भाव से पूजा जाता है | क्या अभी वह समय नहीं आया जब हम अपनी मातृभूमि को देवीमाने और इसका प्रत्येक परमाणु हमारे मन में संपूर्ण देश के प्रति देशभक्ति उत्पन्न कर दे ? जब प्राण प्रतिष्ठा करके हिंदू लोग दुर्गा की प्रतिमा को साक्षात शक्ति मान लेते हैं, तो क्या यह ठीक नहीं है कि हम अपनी मातृभूमि की महिमा को प्रकाशित करें और भारत रूपी सच्ची दुर्गा में जीवन और प्राण प्रतिष्ठा करें ? फिर हमारे सिर और हांथ अपने आप मिल जाएंगे |

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